वो बज़्म कौन सी है कि ज़ेर-ओ-ज़बर न हो

  - Akhtar Usman

वो बज़्म कौन सी है कि ज़ेर-ओ-ज़बर न हो
दिल में तनाब-ए-ख़ैमा-ए-लैला तो वरना हो

ये कार-ए-इश्क़ भी है अजब कार-ए-ना-तमाम
समझें कि हो रहा है मगर उम्र भर न हो

चेहरे पे साए में भी ख़राशें दिखाई दें
आईना-ए-हयात पे इतनी नज़र न हो

दोनों तरफ़ का शोर बराबर सुनाई दे
दोनों तरफ़ किसी को किसी की ख़बर न हो

इक दश्त-ए-बे-दिली में लहू बोलने लगे
ऐसे में एक ख़्वाब कि तू हो मगर न हो

इक आस्ताँ कि जिस पे अबद तक पड़े रहें
इक गुलसिताँ कि जिस में सबा का गुज़र न हो

इक लम्हा-ए-कमाल कि सदियों पे फैल जाए
इक लहज़ा-ए-विसाल मगर मुख़्तसर न हो

इक याद-ए-ख़ुश-जमाल जबाज़-ए-हयात है
इक महवर-ए-ख़याल है ये भी अगर न हो

इक लफ़्ज़ जिस की लौ में दमकता रहे दिमाग़
इक शे'र जिस की गूँज कहीं पेश-तर न हो

इक बात की चढ़ाई कि दम टूटने लगें
कहने का शौक़ हो मगर इतना हुनर न हो

मिट्टी तग़ारचों में पड़ी सूखती रहे
पैकर तराशने के लिए कूज़ा-गर न हो

ऐसा भी क्या कि याद लहू में घुली रहे
ऐसा भी क्या कि उम्र-ए-गुज़श्ता बसर न हो

यूँ ख़त्त-ए-हिज्र खींचिए अपने और उस के बीच
दोनों तरफ़ की साँस इधर से उधर न हो

इक शाम जिस में दिल का सबूचा भरा रहे
इक नाम जिस में दर्द तो हो इस क़दर न हो

शाम आए और घर के लिए दिल मचल उठे
शाम आए और दिल के लिए कोई घर न हो

  - Akhtar Usman

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