Ameen Rahat Chugtai

Ameen Rahat Chugtai

@ameen-rahat-chugtai

Ameen Rahat Chugtai shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ameen Rahat Chugtai's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
रोज़ जो मरता है इस को आदमी लिक्खो कभी
तीरगी के बाब में भी रौशनी लिक्खो कभी

साँस लेना भी मुक़द्दर में नहीं जिस अहद में
बैठ कर उस अहद की भी अन-कही लिक्खो कभी

दर्द-ए-दिल दर्द-ए-जिगर की दास्ताँ लिक्खी बहुत
नान-ए-ख़ुश्क-ओ-आब-ए-कम को ज़िंदगी लिक्खो कभी

मस्लहत पर भी कभी होते रहे क़ुर्बां उसूल
इन उसूलों को भी उन की दिल-लगी लिक्खो कभी

गर समेटे जा रहे हो काम जो करने के थे
उस को 'राहत' साअ'तों की आगही लिक्खो कभी
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Ameen Rahat Chugtai
जो मय-कदे से भी दामन बचा बचा के चले
तिरी गली से जो गुज़रे तो लड़खड़ा के चले

हमें भी क़िस्सा-ए-दार-ओ-रसन से निस्बत है
फ़क़ीह-ए-शहर से कह दो नज़र मिला के चले

कोई तो जाने कि गुज़री है दिल पे क्या जब भी
ख़िज़ाँ के बाग़ में झोंके ख़ुनुक हवा के चले

अब ए'तिराफ़-ए-जफ़ा और किस तरह होगा
कि तेरी बज़्म में क़िस्से मिरी वफ़ा के चले

हज़ार होंट मिले हों तो क्या फ़साना-ए-दिल
सुनाने वाले निगाहों से भी सुना के चले

कहीं सुराग़-ए-चमन मिल ही जाएगा 'राहत'
चलो उधर को जिधर क़ाफ़िले सबा के चले
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Ameen Rahat Chugtai
तीरगी ही तीरगी है बाम-ओ-दर में कौन है
कुछ दिखाई दे तो बतलाएँ नज़र में कौन है

क्यूँ जलाता है मुझे वो आतिश-ए-एहसास से
मैं कहाँ हूँ ये मिरे दीवार-ओ-दर में कौन है

ज़ात के पर्दे से बाहर आ के भी तन्हा रहूँ
मैं अगर हूँ अजनबी तो मेरे घर में कौन है

चाक क्यूँ होते हैं पैराहन गुलों के कुछ कहो
झुक के लहराता हुआ शाख़-ए-समर में कौन है

जैसे कोई पा गया हो अपनी मंज़िल का सुराग़
धूप में बैठा हुआ राह-ए-सफ़र में कौन है

काँपता जा देख कर इज़हार की तज्सीम को
सोचता जा आरज़ू-ए-शीशा-गर में कौन है

बस ज़रा बिफरी हुई मौजों की ख़ू माइल रही
अहल-ए-साहिल जानते तो थे भँवर में कौन है

शोर करता फिर रहा हूँ ख़ुश्क पत्तों की तरह
कोई तो पूछे कि शहर-ए-बे-ख़बर में कौन है

मैं तो दीवाना हूँ इक संग-ए-मलामत ही सही
लेकिन इतना सोच लो शीशे के घर में कौन है
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Ameen Rahat Chugtai
मंज़िल-ए-शम्स-ओ-क़मर से गुज़रे
जब तिरी राहगुज़र से गुज़रे

शब की गाती हुई तन्हाई में
कितने तूफ़ाँ थे जो सर से गुज़रे

वहीं पतझड़ ने पड़ाव डाला
क़ाफ़िले गुल के जिधर से गुज़रे

हर तरफ़ सब्त हैं क़दमों के निशाँ
कोई किस राहगुज़र से गुज़रे

किस क़दर ख़ुद पे हमें प्यार आया
आज जब अपनी नज़र से गुज़रे

सुर्ख़ी-ए-गुल से भी चौंके गुल-रुख़
वो ज़माने भी नज़र से गुज़रे

दश्त-ओ-सहरा का भी दामन सिमटा
तेरे दीवाने जिधर से गुज़रे

ख़ुद-निगर हो गए 'राहत' हम भी
आज वो काश इधर से गुज़रे
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Ameen Rahat Chugtai
क्या बताएँ कहाँ कहाँ थे फूल
ख़ाक उड़ती है अब जहाँ थे फूल

भीगी भीगी सी देख कर कलियाँ
मुस्कुराए जहाँ जहाँ थे फूल

दिल में गुलशन खिला गए क्या क्या
यूँ तो दो दिन के मेहमाँ थे फूल

जब ख़िज़ाँ आई जाँ पे खेल गए
महरम-ए-जेहद-ए-बे-कराँ थे फूल

जिस ने तोड़ा उसी को रंज हुआ
मिस्ल-ए-पैमाना-ए-मुग़ाँ थे फूल

दिन की ज़ुल्मत-नसीब बस्ती में
राहगीरों की कहकशाँ थे फूल
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Ameen Rahat Chugtai
ज़िंदगी एक सज़ा हो जैसे
किसी गुम्बद की सदा हो जैसे

रात के पिछले पहर ध्यान तिरा
कोई साए में खड़ा हो जैसे

आम के पेड़ पे कोयल की सदा
तेरा उस्लूब-ए-वफ़ा हो जैसे

यूँ भड़क उठ्ठे हैं शो'ले दिल के
अपने दामन की हवा हो जैसे

रह गए होंट लरज़ कर अपने
तेरी हर बात बजा हो जैसे

दूर तकता रहा मंज़िल की तरफ़
रह-रव-ए-आबला-पा हो जैसे

यूँ मिला आज वो 'राहत' हम से
एक मुद्दत से ख़फ़ा हो जैसे
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Ameen Rahat Chugtai
हमीं थे जान-ए-बहाराँ हमीं थे रंग-ए-तरब
हमीं हैं बज़्म-ए-मय-ओ-गुल में आज मोहर-ब-लब

वही तुझे भी नज़र आए बे-अदब जो लोग
फ़क़ीह-ए-शहर से उलझे तिरी गली के सबब

ख़याल-ओ-फ़िक्र के फिर सिलसिले सुलग न उठें
कि चुभ रही है दिलों में हवा-ए-गेसू-ए-शब

बस एक जाम ने रिंदों की आबरू रख ली
वगर्ना कम न था वाइ'ज़ का शोर-ए-ग़ैज़-ओ-ग़ज़ब

चलो कली के तबस्सुम का राज़ पूछ आएँ
गुलों के क़ाफ़िले चल दें चमन से जाने कब

अभी से धड़कनें ख़ामोश होती जाती हैं
अजीब होगा समाँ वो भी तुम न आओगे जब

हमें ही ताब-ए-समाअ'त न हो सकी 'राहत'
फ़साना-ख़्वाँ ने तो छेड़ा था ज़िक्र-ए-अहद-ए-तरब
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Ameen Rahat Chugtai
हो सके तो दिल-ए-सद-चाक दिखाया जाए
अब भरी बज़्म में अहवाल सुनाया जाए

हाए उस जान-ए-तमन्ना से निभेगी कैसे
हम से तो राज़ न इक रोज़ छुपाया जाए

अपना ग़म हो तो उसे कह के सुकूँ मिल जाए
उस का ग़म हो तो किसे जा के सुनाया जाए

रात भर जिन की ज़िया से रहे रौशन कमरे
सुब्ह-दम उन ही चराग़ों को बुझाया जाए

ध्यान में जिस के कई जागती रातें गुज़रीं
'राहत' इक रात उसे भी तो जगाया जाए
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Ameen Rahat Chugtai
मैं तिरी दस्तरस से बहुत दूर था
फिर भी नज़दीक आने पे मजबूर था

आज मैं ही सज़ा-वार-ए-जौर-ओ-सितम
कल तिरी माँग का मैं ही सिंदूर था

कौन आता है यूँ ज़ेर-ए-दाम इन दिनों
रात तारीक थी आशियाँ दूर था

कुछ ख़ुलूस-ए-वफ़ा पर भी नादिम था मैं
और कुछ दिल के ज़ख़्मों से भी चूर था

आइना देख कर यूँ नदामत हुई
मैं कि 'राहत' हूँ अब पहले मंसूर था
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Ameen Rahat Chugtai
आज वो फूल बना हुस्न-ए-दिल-आरा देखा
सच हुआ पिछले बरस जो भी कहा था देखा

ध्यान में लाए तसव्वुर में बसाया देखा
इतना ही अजनबी पाया उसे जितना देखा

किस वसीले से भला अर्ज़-ए-तमन्ना करते
हम ने जिस वक़्त भी देखा उसे तन्हा देखा

कब से एहसास पे इक बोझ लिए फिरते हैं
काश पूछो कि भरी बज़्म में क्या क्या देखा

शाह-राहों के घने पेड़ कटे हैं जब से
चौंक उठ्ठे हैं जहाँ अपना भी साया देखा

दफ़अ'तन आ गया फिर डूबते सूरज का ख़याल
शाम के वक़्त जो दरिया का किनारा देखा
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Ameen Rahat Chugtai
जो दुहाई दे रहा है कोई सौदाई न हो
अपने ही घर में किसी ने आग दहकाई न हो

रास्ते में इस से पहले कब था इतना अज़दहाम
जो तमाशा बन रहा है वो तमाशाई न हो

जो मिला नज़रें चुरा कर चल दिया अब क्या कहें
शहर में रह कर कभी इतनी शनासाई न हो

अपनी ही आवाज़ पर चौंके हैं हम तो बार बार
ऐ रफ़ीक़ो बज़्म में इतनी भी तन्हाई न हो

मैं शुआ-ए-महर का मारा सही लेकिन यहाँ
कौन है यारो जो इस सूरज का शैदाई न हो

गुंग भी हैं देख कर बदले हुए मंज़र यहाँ
और ऐसा भी नहीं हम में कि गोयाई न हो

मैं तो अपनी ज़ात का इक रेज़ा-ए-ग़ुम-गश्ता हूँ
वो मुझे ढूँडेगा क्या जो मेरा शैदाई न हो
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Ameen Rahat Chugtai
किसी मकाँ के दरीचे को वा तो होना था
मुझे किसी न किसी दिन सदा तो होना था

जिसे ख़मीदा सरों से मिले क़द-ओ-क़ामत
उसे किसी न किसी दिन ख़ुदा तो होना था

मैं जानता था जबीनों पे बल पड़ेंगे मगर
क़लम का क़र्ज़ था आख़िर अदा तो होना था

ये क्या ज़रूर पता पूछते फिरें उस का
मिला ही यूँ था वो जैसे जुदा तो होना था

वो पिछली रात की ख़ुशबू रची रची सी फ़ज़ा
सहर क़रीब थी वक़्फ़-ए-दुआ तो होना था

हम एक जाँ ही सही दिल तो अपने अपने थे
कहीं कहीं से फ़साना जुदा तो होना था

मैं आइना था छुपाता किसी को क्या राहत
वो देखता मुझे जब भी ख़फ़ा तो होना था
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Ameen Rahat Chugtai
मिरे बदन से कभी आँच इस तरह आए
लिपट के मुझ से मिरे साथ वो भी जल जाए

मैं आग हूँ तो मिरे पास कोई क्यूँ बैठे
मैं राख हूँ तो कोई क्यूँ कुरेदने आए

भरे दयार में अब इस को किस तरह ढूँडें
हवा चले तो कहीं बू-ए-हम-नफ़स आए

ये रात और रिवायात की ये ज़ंजीरें
गली के मोड़ से दो लौटते हुए साए

वही बदन वही चेहरा वही लिबास मगर
कोई कहाँ से 'बसावन' का मू-क़लम लाए

कोई तो बात हुई है अजीब सी 'राहत'
कि आइना भी न वो छोड़े और शरमाए
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Ameen Rahat Chugtai
देख कोह-ए-ना-रसा बन कर भरम रक्खा तिरा
मैं कि था इक ज़र्रा-ए-बे-ताब ऐ सहरा तिरा

कौन साक़ी कैसा पैमाना कहाँ सहबा-ए-तेज़
आबरू यूँ रह गई है सर में था सौदा तिरा

सब गिरेबाँ सी रहे हैं सेहन-ए-गुल में बैठ कर
कौन अब सहरा को जाए, है कहाँ चर्चा तिरा

अब अनासिर में तवाज़ुन ढूँडने जाएँ कहाँ
हम जिसे हमराज़ समझे पासबाँ निकला तिरा

बंद दरवाज़े किए बैठे हैं अब अहल-ए-जुनूँ
तख़्तियाँ नामों की पढ़ कर क्या करे रुस्वा तिरा

दाद तो अहल-ए-मुरव्वत दे गए राहत तुझे
शेर भी उन को नज़र आया कोई अच्छा तिरा
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Ameen Rahat Chugtai
जरस-ए-मय ने पुकारा है उठो और सुनो
शैख़ आए हैं सू-ए-मय-कदा लो और सुनो

किस तरह उजड़े सुलगती हुई यादों के दिए
हमदमो दिल के क़रीब आओ रुको और सुनो

ज़ख़्म-ए-हस्ती है कोई ज़ख़्म-ए-मोहब्बत तो नहीं
टीस उठ्ठे भी तो फ़रियाद न हो और सुनो

ख़ुद ही हर घाव पे कहते हो ज़बाँ गंग रहे
ख़ुद ही फिर पुर्सिश-ए-अहवाल करो और सुनो

दास्ताँ कहते हैं जलते हुए फूलों के चराग़
अभी कुछ और सुनो दीदा-वरो और सुनो

शहरयारों के हैं हर गाम पे चर्चे 'राहत'
ये वो बस्ती है कि बस कुछ न कहो और सुनो
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Ameen Rahat Chugtai
जब कोई भी ख़ाक़ान सर-ए-बाम न होगा
फिर अहल-ए-ज़मीं पर कोई इल्ज़ाम न होगा

कल वो हमें पहचान न पाए सर-ए-राहे
शायद उन्हें अब हम से कोई काम न होगा

फिर कौन समझ पाएगा असरार-ए-हक़ीक़त
जब फ़ैसला कोई भी सर-ए-आम न होगा

ये अहद-ए-रवाँ ख़ाक-निशाँ ध्यान में रक्खो
फिर ढूँडोगे किस को जो कोई नाम न होगा

बनने को है इक रोज़ परिंदों का मुक़द्दर
उतरेंगे तो हम-रंग-ए-ज़मीं दाम न होगा

महफ़िल में अगर ज़िक्र हो अरबाब-ए-वफ़ा का
ऐसा नहीं 'राहत' कि तिरा नाम न होगा
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Ameen Rahat Chugtai