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Top 10 of Ameen Rahat Chugtai

Ameen Rahat Chugtai

Top 10 of Ameen Rahat Chugtai

    जरस-ए-मय ने पुकारा है उठो और सुनो
    शैख़ आए हैं सू-ए-मय-कदा लो और सुनो

    किस तरह उजड़े सुलगती हुई यादों के दिए
    हमदमो दिल के क़रीब आओ रुको और सुनो

    ज़ख़्म-ए-हस्ती है कोई ज़ख़्म-ए-मोहब्बत तो नहीं
    टीस उट्ठे भी तो फ़रियाद न हो और सुनो

    ख़ुद ही हर घाव पे कहते हो ज़बाँ गंग रहे
    ख़ुद ही फिर पुर्सिश-ए-अहवाल करो और सुनो

    दास्ताँ कहते हैं जलते हुए फूलों के चराग़
    अभी कुछ और सुनो दीदा-वरो और सुनो

    शहरयारों के हैं हर गाम पे चर्चे 'राहत'
    ये वो बस्ती है कि बस कुछ न कहो और सुनो
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    मिरे बदन से कभी आँच इस तरह आए
    लिपट के मुझ से मिरे साथ वो भी जल जाए

    मैं आग हूँ तो मिरे पास कोई क्यूँँ बैठे
    मैं राख हूँ तो कोई क्यूँँ कुरेदने आए

    भरे दयार में अब इस को किस तरह ढूँडें
    हवा चले तो कहीं बू-ए-हम-नफ़स आए

    ये रात और रिवायात की ये ज़ंजीरें
    गली के मोड़ से दो लौटते हुए साए

    वही बदन वही चेहरा वही लिबास मगर
    कोई कहाँ से 'बसावन' का मू-क़लम लाए

    कोई तो बात हुई है अजीब सी 'राहत'
    कि आइना भी न वो छोड़े और शरमाए
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    किसी मकाँ के दरीचे को वा तो होना था
    मुझे किसी न किसी दिन सदा तो होना था

    जिसे ख़मीदा सरों से मिले क़द-ओ-क़ामत
    उसे किसी न किसी दिन ख़ुदा तो होना था

    मैं जानता था जबीनों पे बल पड़ेंगे मगर
    क़लम का क़र्ज़ था आख़िर अदा तो होना था

    ये क्या ज़रूर पता पूछते फिरें उस का
    मिला ही यूँँ था वो जैसे जुदा तो होना था

    वो पिछली रात की ख़ुशबू रची रची सी फ़ज़ा
    सहर क़रीब थी वक़्फ़-ए-दुआ तो होना था

    हम एक जाँ ही सही दिल तो अपने अपने थे
    कहीं कहीं से फ़साना जुदा तो होना था

    मैं आइना था छुपाता किसी को क्या राहत
    वो देखता मुझे जब भी ख़फ़ा तो होना था
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    जो दुहाई दे रहा है कोई सौदाई न हो
    अपने ही घर में किसी ने आग दहकाई न हो

    रास्ते में इस से पहले कब था इतना अज़दहाम
    जो तमाशा बन रहा है वो तमाशाई न हो

    जो मिला नज़रें चुरा कर चल दिया अब क्या कहें
    शहर में रह कर कभी इतनी शनासाई न हो

    अपनी ही आवाज़ पर चौंके हैं हम तो बार बार
    ऐ रफ़ीक़ो बज़्म में इतनी भी तन्हाई न हो

    मैं शुआ-ए-महर का मारा सही लेकिन यहाँ
    कौन है यारो जो इस सूरज का शैदाई न हो

    गुंग भी हैं देख कर बदले हुए मंज़र यहाँ
    और ऐसा भी नहीं हम में कि गोयाई न हो

    मैं तो अपनी ज़ात का इक रेज़ा-ए-ग़ुम-गश्ता हूँ
    वो मुझे ढूँडेगा क्या जो मेरा शैदाई न हो
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    आज वो फूल बना हुस्न-ए-दिल-आरा देखा
    सच हुआ पिछले बरस जो भी कहा था देखा

    ध्यान में लाए तसव्वुर में बसाया देखा
    इतना ही अजनबी पाया उसे जितना देखा

    किस वसीले से भला अर्ज़-ए-तमन्ना करते
    हम ने जिस वक़्त भी देखा उसे तन्हा देखा

    कब से एहसास पे इक बोझ लिए फिरते हैं
    काश पूछो कि भरी बज़्म में क्या क्या देखा

    शाह-राहों के घने पेड़ कटे हैं जब से
    चौंक उट्ठे हैं जहाँ अपना भी साया देखा

    दफ़्'अ'तन आ गया फिर डूबते सूरज का ख़याल
    शाम के वक़्त जो दरिया का किनारा देखा
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    मैं तिरी दस्तरस से बहुत दूर था
    फिर भी नज़दीक आने पे मजबूर था

    आज मैं ही सज़ा-वार-ए-जौर-ओ-सितम
    कल तिरी माँग का मैं ही सिंदूर था

    कौन आता है यूँँ ज़ेर-ए-दाम इन दिनों
    रात तारीक थी आशियाँ दूर था

    कुछ ख़ुलूस-ए-वफ़ा पर भी नादिम था मैं
    और कुछ दिल के ज़ख़्मों से भी चूर था

    आइना देख कर यूँँ नदामत हुई
    मैं कि 'राहत' हूँ अब पहले मंसूर था
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    ज़िंदगी एक सज़ा हो जैसे
    किसी गुम्बद की सदा हो जैसे

    रात के पिछले पहर ध्यान तिरा
    कोई साए में खड़ा हो जैसे

    आम के पेड़ पे कोयल की सदा
    तेरा उस्लूब-ए-वफ़ा हो जैसे

    यूँँ भड़क उट्ठे हैं शो'ले दिल के
    अपने दामन की हवा हो जैसे

    रह गए होंट लरज़ कर अपने
    तेरी हर बात बजा हो जैसे

    दूर तकता रहा मंज़िल की तरफ़
    रह-रव-ए-आबला-पा हो जैसे

    यूँँ मिला आज वो 'राहत' हम से
    एक मुद्दत से ख़फ़ा हो जैसे
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    तीरगी ही तीरगी है बाम-ओ-दर में कौन है
    कुछ दिखाई दे तो बतलाएँ नज़र में कौन है

    क्यूँँ जलाता है मुझे वो आतिश-ए-एहसास से
    मैं कहाँ हूँ ये मिरे दीवार-ओ-दर में कौन है

    ज़ात के पर्दे से बाहर आ के भी तन्हा रहूँ
    मैं अगर हूँ अजनबी तो मेरे घर में कौन है

    चाक क्यूँँ होते हैं पैराहन गुलों के कुछ कहो
    झुक के लहराता हुआ शाख़-ए-समर में कौन है

    जैसे कोई पा गया हो अपनी मंज़िल का सुराग़
    धूप में बैठा हुआ राह-ए-सफ़र में कौन है

    काँपता जा देख कर इज़हार की तज्सीम को
    सोचता जा आरज़ू-ए-शीशा-गर में कौन है

    बस ज़रा बिफरी हुई मौजों की ख़ू माइल रही
    अहल-ए-साहिल जानते तो थे भँवर में कौन है

    शोर करता फिर रहा हूँ ख़ुश्क पत्तों की तरह
    कोई तो पूछे कि शहर-ए-बे-ख़बर में कौन है

    मैं तो दीवाना हूँ इक संग-ए-मलामत ही सही
    लेकिन इतना सोच लो शीशे के घर में कौन है
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    जो मय-कदे से भी दामन बचा बचा के चले
    तिरी गली से जो गुज़रे तो लड़खड़ा के चले

    हमें भी क़िस्सा-ए-दार-ओ-रसन से निस्बत है
    फ़क़ीह-ए-शहरस कह दो नज़र मिला के चले

    कोई तो जाने कि गुज़री है दिल पे क्या जब भी
    ख़िज़ाँ के बाग़ में झोंके ख़ुनुक हवा के चले

    अब ए'तिराफ़-ए-जफ़ा और किस तरह होगा
    कि तेरी बज़्म में क़िस्से मिरी वफ़ा के चले

    हज़ार होंट मिले हों तो क्या फ़साना-ए-दिल
    सुनाने वाले निगाहों से भी सुना के चले

    कहीं सुराग़-ए-चमन मिल ही जाएगा 'राहत'
    चलो उधर को जिधर क़ाफ़िले सबा के चले
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    Ameen Rahat Chugtai
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    रोज़ जो मरता है इस को आदमी लिक्खो कभी
    तीरगी के बाब में भी रौशनी लिक्खो कभी

    साँस लेना भी मुक़द्दर में नहीं जिस अहद में
    बैठ कर उस अहद की भी अन-कही लिक्खो कभी

    दर्द-ए-दिल दर्द-ए-जिगर की दास्ताँ लिक्खी बहुत
    नान-ए-ख़ुश्क-ओ-आब-ए-कम को ज़िंदगी लिक्खो कभी

    मस्लहत पर भी कभी होते रहे क़ुर्बां उसूल
    इन उसूलों को भी उन की दिल-लगी लिक्खो कभी

    गर समेटे जा रहे हो काम जो करने के थे
    उस को 'राहत' साअ'तों की आगही लिक्खो कभी
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