तीरगी ही तीरगी है बाम-ओ-दर में कौन है

कुछ दिखाई दे तो बतलाएँ नज़र में कौन है

क्यूँ जलाता है मुझे वो आतिश-ए-एहसास से
मैं कहाँ हूँ ये मिरे दीवार-ओ-दर में कौन है

ज़ात के पर्दे से बाहर आ के भी तन्हा रहूँ
मैं अगर हूँ अजनबी तो मेरे घर में कौन है

चाक क्यूँ होते हैं पैराहन गुलों के कुछ कहो
झुक के लहराता हुआ शाख़-ए-समर में कौन है

जैसे कोई पा गया हो अपनी मंज़िल का सुराग़
धूप में बैठा हुआ राह-ए-सफ़र में कौन है

काँपता जा देख कर इज़हार की तज्सीम को
सोचता जा आरज़ू-ए-शीशा-गर में कौन है

बस ज़रा बिफरी हुई मौजों की ख़ू माइल रही
अहल-ए-साहिल जानते तो थे भँवर में कौन है

शोर करता फिर रहा हूँ ख़ुश्क पत्तों की तरह
कोई तो पूछे कि शहर-ए-बे-ख़बर में कौन है

मैं तो दीवाना हूँ इक संग-ए-मलामत ही सही
लेकिन इतना सोच लो शीशे के घर में कौन है

— Ameen Rahat Chugtai

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