जो दुहाई दे रहा है कोई सौदाई न हो

अपने ही घर में किसी ने आग दहकाई न हो

रास्ते में इस से पहले कब था इतना अज़दहाम
जो तमाशा बन रहा है वो तमाशाई न हो

जो मिला नज़रें चुरा कर चल दिया अब क्या कहें
शहर में रह कर कभी इतनी शनासाई न हो

अपनी ही आवाज़ पर चौंके हैं हम तो बार बार
ऐ रफ़ीक़ो बज़्म में इतनी भी तन्हाई न हो

मैं शुआ-ए-महर का मारा सही लेकिन यहाँ
कौन है यारो जो इस सूरज का शैदाई न हो

गुंग भी हैं देख कर बदले हुए मंज़र यहाँ
और ऐसा भी नहीं हम में कि गोयाई न हो

मैं तो अपनी ज़ात का इक रेज़ा-ए-ग़ुम-गश्ता हूँ
वो मुझे ढूँडेगा क्या जो मेरा शैदाई न हो

— Ameen Rahat Chugtai

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