M Kothiyavi Rahi

M Kothiyavi Rahi

@m-kothiyavi-rahi

M Kothiyavi Rahi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in M Kothiyavi Rahi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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वादी वादी गाने वाला आएगा
फिर कब वो मुफ़्लिस-शहज़ादा आएगा

क्यों मैं कहूँ तू मेरा दोस्त भी लगता है
सब के लबों पर कल ये क़िस्सा आएगा

बंजर धरती तारों से मत पानी माँग
फिर कोई बादल आवारा आएगा

ख़्वाबों में भी हम को ये उम्मीद न थी
आँख खुले पर ध्यान न तेरा आएगा

आईना आईना इतराने वाला
मेरे आगे बिखरा बिखरा आएगा
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M Kothiyavi Rahi
फ़ुसूँ कर गई रात पागल हवा
उड़ा ले गई सुर्ख़ आँचल हवा

हुई जिस घड़ी धूल से दोस्ती
बनी दश्त-ए-ग़ुर्बत में बादल हवा

मुझे ज़िंदगी इक गुलिस्ताँ लगे
दिखा चल के अब उस को जंगल हवा

जला दे इरादों के तूफ़ान को
बुझा दे अगर तेरी मशअ'ल हवा

सड़क पर बदन इक पड़ा देख कर
चली घूम कर सू-ए-मक़्तल हवा

ख़ुशी के चराग़ों ने समझा है कब
तुझे ऐ शब-ए-ग़म की बोझल हवा

लहू रात की रात गिरता रहा
रही रात की रात जल-थल हवा
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M Kothiyavi Rahi
तुम्हारे पैकर से फूटने वाली रौशनी मेरी राह में है
ये फ़ासला इस लिए गवारा कि इक हक़ीक़त निगाह में है

फ़सील-ए-ग़म गिर गई तो किस से लिपट के रोएँगे शहर-ए-याराँ
ये सोच कर झूम उठा हूँ यारो कि ग़म ख़ुद अपनी पनाह में है

मैं ज़िंदगी तज के आ रहा हूँ इसी लिए मुस्कुरा रहा हूँ
ज़रा बताओ कि किस लिए अब कजी तुम्हारी कुलाह में है

तुम्हारे बाग़ों से दूर वीरान रेगज़ारों में गुल खिले हैं
शफ़क़ उफ़ुक़ के हिसार में है शगुफ़्तगी शाहराह में है

नदी नदी बे-कराँ ख़मोशी शजर शजर सोगवार साए
ये रात बीमार हो गई है कि मुब्तला फिर गुनाह में है

उदास यादों ने बाब-ए-अफ़्कार पर कई बार दस्तकें दीं
मगर क़लम है कि गुल-फ़िशाँ बिन्त-ए-शब की आराम-गाह में है

कोई क़लंदर है कोई दरवेश कोई वहशी है कोई 'राही'
हर एक शोरीदा-सर बराए-सहर तिरी ख़ानक़ाह में है
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M Kothiyavi Rahi
ऐ दश्त-ए-शब-गुज़ार तिरी आस का हिरन
खाई में यास की जो गिरा रो पड़ी पवन

जा कर दयार-ए-मर्ग में छोड़ आइए उसे
जो घूमता है ओढ़े हुए दर्द का कफ़न

अब तुझ से ही जलाऊँगा ये गुल-शुदा चराग़
ऐ टिमटिमाती रात ढले चाँद की किरन

अब तेरे ख़त को ढूँड रहा हूँ वरक़ वरक़
उक्ता चुका है हर्फ़-ओ-हिकायत से मेरा मन

आवाज़ आ रही है फ़सील-ए-नजात से
तेरी कमी खटकती है ऐ मेरे हम-वतन

यज़्दाँ ख़ता मुआ'फ़ गिरा जा रहा हूँ मैं
फिर आदमी के भेस में आया है अहरमन
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M Kothiyavi Rahi
यास मकान-ए-दिल से निकल कर कोने कोने जलने वाली
दरमाँदा सी लौट आई है रात है शायद ढलने वाली

तुम को हमारी चाह नहीं है जब से ये विश्वास हुआ है
हर तहरीर जला डाली है सोच है रूप बदलने वाली

चाँद की ख़ुद्दारी से मैं अब दर्स-ए-ख़ुद-आगही लेता हूँ
वर्ना ये मायूसी की ज़ुल्मत सदियों से थी बदलने वाली

गीतों को दफ़ना दो यहीं पर चीख़ों के उस्लूब जन्म दो
हंगामों की रीत यही है और यही है चलने वाली

कैसे कैसे साहिब-ए-नज़राँ सर-ब-गरेबाँ घूम रहे हैं
आज है जाने किस की सवारी फ़न के मकाँ से निकलने वाली
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M Kothiyavi Rahi
काजल शाम की आँख से ढलके आँचल तेरे शाने से
और ज़रा ग़म भी ले आएँ यादों के वीराने से

क्या उस ने सोचा होगा जब ख़त मेरा पहुँचा होगा
सोच रहा हूँ देख आऊँ मैं जा कर किसी बहाने से

चाहत के दो बदन शहर में अलग अलग क्यों रहते हैं
टकराने की हिम्मत भी थी जब बे-दर्द ज़माने से

सोने चाँदी की दीवारें ढह देना आसान न था
लेकिन तुम तो बहक गए इस दुनिया के बहकाने से

उजड़ गई जब प्यार की महफ़िल चले गए सब दिल वाले
तन्हा राहे बहल रहा है माज़ी के अफ़्साने से
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M Kothiyavi Rahi
हिज्र का चाँद दर्द की नद्दी
यही सूरत है अपनी दुनिया की

रेगज़ारों में संग खिलते हैं
जैसे बाग़ों में शाख़ शाख़ कली

मेरा घर है कि 'मीर'-साहिब का
उफ़ ये होंटों पे तल्ख़ तल्ख़ हँसी

आ गया मौसम-ए-ज़मिस्ताँ क्या
आग की जुस्तुजू में रात कटी

कू-ब-कू दर-ब-दर भटकते हुए
देख ली आज मौत की भी गली

क़ुफ़्ल होंटों का टूट कर ही रहा
दिल-ए-अफ़सुर्दा रात बीत चली

एक चलती हुई ग़ज़ल पर रात
'राही'-ए-ग़म-ज़दा ने नज़्म कही
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M Kothiyavi Rahi
घूमूँ नहीं तो क्या मैं कहीं जा के पड़ रहूँ
बीमार आदमी की तरह रात काट दूँ

देखेगा आज मेरी तरफ़ कौन प्यार से
बुझता हुआ चराग़ हूँ पतझड़ का चाँद हूँ

तस्वीर बन के देख रहा हूँ जहान को
तू ही बता कि और मैं अब कैसे चुप रहूँ

शीरीं है ज़हर मौत का ऐ तल्ख़ी-ए-हयात
जी चाहता है आज तिरा जाम तोड़ दूँ

इस बारे में तो आप से बेहतर हूँ मैं ज़रूर
पीना भी पड़ गया तो पिया है ख़ुद अपना ख़ूँ

ख़त लिख के फाड़ देना मिरे मशग़लों में है
पढ़ती रही है आग मिरा नामा-ए-ज़ुबूँ

गिर जाएगी ये छत जो चली झूम कर हवा
'राही' मिरी हयात है इक क़स्र-ए-बे-सुतूँ
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M Kothiyavi Rahi
दर्द को दर्द से निस्बत होगी
क्यों सोचें कि मोहब्बत होगी

जान किसी को दी थी तुम ने
अब जो जिए तो नदामत होगी

तुम से मुझे कुछ काम नहीं है
तुम को मेरी ज़रूरत होगी

आओ ख़ुदा की बस्ती है ये
किसी खंडर में इबादत होगी

कुटियाओं का लुटेरा होगा
जिस की नई इमारत होगी

बैठा हूँ फिर दिया जलाए
परवानों की ज़ियाफ़त होगी

जिस्म किसी का गर्म नहीं है
'राही' तुम को हरारत होगी
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M Kothiyavi Rahi
जलेगा चाँद सितारे धुआँ उड़ाएँगे
हमारे ख़्वाब तिरी आँख में जब आएँगे

मिरी नज़र से वो चेहरे उतर नहीं सकते
जिन्हें ये अहल-ए-नज़र जल्द भूल जाएँगे

ग़ज़ल सुनाओ बहलना बहुत ज़रूरी है
हँसेंगे लोग हम आँसू अगर बहाएँगे

फिर आई शाम दरख़्तों पे घोंसले जागे
मगर हम आज भी ऐ दोस्त घर न जाएँगे

उदास रहिए न उक्ता के ख़ुद-कुशी कीजे
वो दिन क़रीब है जब आप गुल खिलाएँगे

कफ़न से कम नहीं जाड़े की चाँदनी 'राही'
अब इस को ओढ़ के हम कैसे मुस्कुराएँगे
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M Kothiyavi Rahi
रस्ता किसी वहशी का अभी देख रहा है
ये पेड़ जो इस राह में सदियों से खड़ा है

ग़ुर्बत के अँधेरे में तिरी याद के जुगनू
चमके हैं तो राहों का सफ़र और बढ़ा है

दुनिया से अलग हो के गुज़रती है जवानी
हालाँ कि ये मुमकिन नहीं पुरखों से सुना है

चाहत जो जुनूँ के लिए ज़ंजीर बनी थी
आज उस को भी वहशत ने मिरी तोड़ दिया है

यारो न अभी अपने ठिकानों को सिधारो
कुछ बात करो रात कटे सर्द हवा है

इक ग़म का अलाव है जिसे घेर के सब लोग
बैठे हैं कि 'राही' ने नया गीत लिखा है
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M Kothiyavi Rahi
इक अंजान राह पर दोनों
मिल गए आज बे-ख़तर दोनों

फूल है एक एक पत्थर है
बन गए कैसे हम-सफ़र दोनों

फ़ासले ऐसे कम नहीं होंगे
छोड़ दें अपना अपना घर दोनों

टक्करें ले रहे हैं दुनिया से
दिल में रखते नहीं हैं डर दोनों

ताड़ लेते हैं ताड़ने वाले
गो मिलाते नहीं नज़र दोनों

रात इक दूसरे में डूब गए
हो गए ख़ुद से बे-ख़बर दोनों

हो के गुमराह आज-कल 'राही'
फिर रहे हैं नगर नगर दोनों
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M Kothiyavi Rahi
साहबो मंज़िल-ए-जानाँ की तरफ़ जाना मत
और जाना तो कहानी कोई दोहराना मत

गुल खिला देगा महकते हुए चेहरों का तिलिस्म
शहर-ए-आईना दिल-ए-ज़ार को दिखलाना मत

मुझ को चाहा है तो बख़्शो मिरी चाहत को दवाम
बन के रह जाना ढली रात का अफ़्साना मत

वस्ल की चाह में रुकना न किसी जिस्म के पास
दौलत-ए-हिज्र को सौदाइयो ठुकराना मत

सर-बुरीदा सी गुज़र जाना शहीदों की तरह
तितलियो दिल के दबिस्ताँ में ठहर जाना मत

उल्फ़तें सब को मयस्सर नहीं होतीं प्यारे
तिश्ना लम्हों की मुलाक़ात से उकताना मत

मक़्तल-ए-इश्क़ न अब कूचा-ए-क़ातिल 'राही'
शहर-ए-बे-ख़्वाब में जाते हुए घबराना मत
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M Kothiyavi Rahi
उक़ाब-ए-फ़िक्र अकेला है बर्फ़-ज़ारों में
कि चाँद जाड़े का जैसे लरज़ते तारों में

वो आँख नोच दे जिस को भरी बहारों में
लहू का रंग नज़र आए आबशारों में

चला है क़ाफ़िला-ए-आशिक़ाँ कि शोला-रुख़ाँ
दबी दबी सी हैं चिंगारियाँ ग़ुबारों में

सँभल गया मिरा गिरता बदन उठा के तुझे
मैं फिर चला हूँ फिसलते हुए दयारों में

सुकूत-ए-फ़िक्र के उनवाँ पे बात चल निकली
इक ऐसा शे'र पढ़ आए हैं शहर-यारों में
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M Kothiyavi Rahi
दराज़-क़ामत दराज़-गेसू अजीब सा इक निगार था वो
गुलों की बाग उस के हाथ में थी हवाओं पर जब सवार था वो

जुनूँ था बन कर लहू रगों में कि रात दिन दौड़ते थे लम्हे
थके न थे वो जो रुक गए थे मिरे लिए बे-क़रार था वो

मिरे ख़ुदा हुस्न के दफ़ीने को मत ख़ज़ाने का मर्तबा दे
कि पा के जो उस को ख़ुश बहुत था गँवा के कल अश्क-बार था वो

उबल पड़े नफ़रतों के सोते कि हो गई ख़ुश्क झील ग़म की
शिकस्त-ख़ुर्दा सा मुँह छुपाए न जाने किस का शिकार था वो

कभी कभी जो सुना गया था कहीं कहीं जो पढ़ा गया था
किताब में बंद हो चुका है इक उम्र का शाहकार था वो

वो दोस्तों दुश्मनों का प्यारा फिरा तमाम उम्र मारा मारा
सुना है कल ग़म ने मार डाला कि जिस का देरीना यार था वो

अजीब राही था रेग-ज़ारों में प्यास लम्हों की बो रहा था
मगर चट्टानों से गिर रहा था कि शब में इक आबशार था वो
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M Kothiyavi Rahi
अब तो ये सोच के भी दिल मिरा घबराता है
सुब्ह का भूला हुआ शाम को घर आता है

एक इक करके बुझे जाते हैं रख़्शंदा नुजूम
एक तू है जो ब-हर-सम्त नज़र आता है

अब तिरा ख़्वाब भी इक पैकर-ए-सीमीं की तरह
आसमानों से मिरे दिल में उतर आता है

लज़्ज़त-ए-संग की ख़ातिर ही बयाबाँ से कोई
छोड़ कर बाग़ सर-ए-राह गुज़र आता है

दिल की दहलीज़ से जाता है जो इक मरमरीं जिस्म
हर तरफ़ घूम के बा-दीदा-ए-तर आता है

जिस्म थक कर भी नहीं राह में रुकता पल भर
दिल मगर उस के शबिस्ताँ में ठहर आता है
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