काजल शाम की आँख से ढलके आँचल तेरे शाने से
और ज़रा ग़म भी ले आएँ यादों के वीराने से
और ज़रा ग़म भी ले आएँ यादों के वीराने से
क्या उस ने सोचा होगा जब ख़त मेरा पहुँचा होगा
सोच रहा हूँ देख आऊँ मैं जा कर किसी बहाने से
चाहत के दो बदन शहर में अलग अलग क्यूँ रहते हैं
टकराने की हिम्मत भी थी जब बे-दर्द ज़माने से
सोने चाँदी की दीवारें ढह देना आसान न था
लेकिन तुम तो बहक गए इस दुनिया के बहकाने से
उजड़ गई जब प्यार की महफ़िल चले गए सब दिल वाले
तन्हा राहे बहल रहा है माज़ी के अफ़्साने से
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तुम को हमारी चाह नहीं है जब से ये विश्वास हुआ है
हर तहरीर जला डाली है सोच है रूप बदलने वाली
चाँद की ख़ुद्दारी से मैं अब दर्स-ए-ख़ुद-आगही लेता हूँ
वर्ना ये मायूसी की ज़ुल्मत सदियों से थी बदलने वाली
गीतों को दफ़ना दो यहीं पर चीख़ों के उस्लूब जन्म दो
हंगामों की रीत यही है और यही है चलने वाली
कैसे कैसे साहिब-ए-नज़राँ सर-ब-गरेबाँ घूम रहे हैं
आज है जाने किस की सवारी फ़न के मकाँ से निकलने वाली
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जा कर दयार-ए-मर्ग में छोड़ आइए उसे
जो घूमता है ओढ़े हुए दर्द का कफ़न
अब तुझ से ही जलाऊँगा ये गुल-शुदा चराग़
ऐ टिमटिमाती रात ढले चाँद की किरन
अब तेरे ख़त को ढूँड रहा हूँ वरक़ वरक़
उक्ता चुका है हर्फ़-ओ-हिकायत से मेरा मन
आवाज़ आ रही है फ़सील-ए-नजात से
तेरी कमी खटकती है ऐ मेरे हम-वतन
यज़्दाँ ख़ता मुआ'फ़ गिरा जा रहा हूँ मैं
फिर आदमी के भेस में आया है अहरमन
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फ़सील-ए-ग़म गिर गई तो किस से लिपट के रोएँगे शहर-ए-याराँ
ये सोच कर झूम उठा हूँ यारो कि ग़म ख़ुद अपनी पनाह में है
मैं ज़िंदगी तज के आ रहा हूँ इसी लिए मुस्कुरा रहा हूँ
ज़रा बताओ कि किस लिए अब कजी तुम्हारी कुलाह में है
तुम्हारे बाग़ों से दूर वीरान रेगज़ारों में गुल खिले हैं
शफ़क़ उफ़ुक़ के हिसार में है शगुफ़्तगी शाहराह में है
नदी नदी बे-कराँ ख़मोशी शजर शजर सोगवार साए
ये रात बीमार हो गई है कि मुब्तला फिर गुनाह में है
उदास यादों ने बाब-ए-अफ़्कार पर कई बार दस्तकें दीं
मगर क़लम है कि गुल-फ़िशाँ बिन्त-ए-शब की आराम-गाह में है
कोई क़लंदर है कोई दरवेश कोई वहशी है कोई 'राही'
हर एक शोरीदा-सर बराए-सहर तिरी ख़ानक़ाह में है
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हुई जिस घड़ी धूल से दोस्ती
बनी दश्त-ए-ग़ुर्बत में बादल हवा
मुझे ज़िंदगी इक गुलिस्ताँ लगे
दिखा चल के अब उस को जंगल हवा
जला दे इरादों के तूफ़ान को
बुझा दे अगर तेरी मशअ'ल हवा
सड़क पर बदन इक पड़ा देख कर
चली घूम कर सू-ए-मक़्तल हवा
ख़ुशी के चराग़ों ने समझा है कब
तुझे ऐ शब-ए-ग़म की बोझल हवा
लहू रात की रात गिरता रहा
रही रात की रात जल-थल हवा
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M Kothiyavi Rahi
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अब तो ये सोच के भी दिल मिरा घबराता है
सुब्ह का भूला हुआ शाम को घर आता है
सुब्ह का भूला हुआ शाम को घर आता है
एक इक कर के बुझे जाते हैं रख़्शंदा नुजूम
एक तू है जो ब-हर-सम्त नज़र आता है
अब तिरा ख़्वाब भी इक पैकर-ए-सीमीं की तरह
आसमानों से मिरे दिल में उतर आता है
लज़्ज़त-ए-संग की ख़ातिर ही बयाबाँ से कोई
छोड़ कर बाग़ सर-ए-राह गुज़र आता है
दिल की दहलीज़ से जाता है जो इक मरमरीं जिस्म
हर तरफ़ घूम के बा-दीदा-ए-तर आता है
जिस्म थक कर भी नहीं राह में रुकता पल भर
दिल मगर उस के शबिस्ताँ में ठहर आता है
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इक अंजान राह पर दोनों
मिल गए आज बे-ख़तर दोनों
मिल गए आज बे-ख़तर दोनों
फूल है एक एक पत्थर है
बन गए कैसे हम-सफ़र दोनों
फ़ासले ऐसे कम नहीं होंगे
छोड़ दें अपना अपना घर दोनों
टक्करें ले रहे हैं दुनिया से
दिल में रखते नहीं हैं डर दोनों
ताड़ लेते हैं ताड़ने वाले
गो मिलाते नहीं नज़र दोनों
रात इक दूसरे में डूब गए
हो गए ख़ुद से बे-ख़बर दोनों
हो के गुमराह आज-कल 'राही'
फिर रहे हैं नगर नगर दोनों
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जलेगा चाँद सितारे धुआँ उड़ाएँगे
हमारे ख़्वाब तिरी आँख में जब आएँगे
हमारे ख़्वाब तिरी आँख में जब आएँगे
मिरी नज़र से वो चेहरे उतर नहीं सकते
जिन्हें ये अहल-ए-नज़र जल्द भूल जाएँगे
ग़ज़ल सुनाओ बहलना बहुत ज़रूरी है
हँसेंगे लोग हम आँसू अगर बहाएँगे
फिर आई शाम दरख़्तों पे घोंसले जागे
मगर हम आज भी ऐ दोस्त घर न जाएँगे
उदास रहिए न उक्ता के ख़ुद-कुशी कीजे
वो दिन क़रीब है जब आप गुल खिलाएँगे
कफ़न से कम नहीं जाड़े की चाँदनी 'राही'
अब इस को ओढ़ के हम कैसे मुस्कुराएँगे
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घूमूँ नहीं तो क्या मैं कहीं जा के पड़ रहूँ
बीमार आदमी की तरह रात काट दूँ
बीमार आदमी की तरह रात काट दूँ
देखेगा आज मेरी तरफ़ कौन प्यार से
बुझता हुआ चराग़ हूँ पतझड़ का चाँद हूँ
तस्वीर बन के देख रहा हूँ जहान को
तू ही बता कि और मैं अब कैसे चुप रहूँ
शीरीं है ज़हर मौत का ऐ तल्ख़ी-ए-हयात
जी चाहता है आज तिरा जाम तोड़ दूँ
इस बारे में तो आप से बेहतर हूँ मैं ज़रूर
पीना भी पड़ गया तो पिया है ख़ुद अपना ख़ूँ
ख़त लिख के फाड़ देना मिरे मशग़लों में है
पढ़ती रही है आग मिरा नामा-ए-ज़ुबूँ
गिर जाएगी ये छत जो चली झूम कर हवा
'राही' मिरी हयात है इक क़स्र-ए-बे-सुतूँ
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