वो एक पक्षी जो गुंजन कर रहा है
वो मुझ
वो मुझ
में प्रेम सृजन कर रहा है
बहुत दिन हो गए है तुम से बिछड़े
तुम्हें मिलने को अब मन कर रहा है
नदी के शांत तट पर बैठ कर मन
तेरी यादें विसर्जन कर रहा है
Read Fullबहुत दिन हो गए है तुम से बिछड़े
तुम्हें मिलने को अब मन कर रहा है
नदी के शांत तट पर बैठ कर मन
तेरी यादें विसर्जन कर रहा है
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जब भी उस की गली में भ्रमण होता है
उस के द्वार पर आत्मसमर्पण होता है
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हो गया आप का आगमन नींद में
छू कर गुज़री मुझ को जो पवन नींद में
छू कर गुज़री मुझ को जो पवन नींद में
मुझ को फूलों की वर्षा में नहला गया
मुस्कुराता हुआ इक गगन नींद में
कैसे उद्धार होगा मेरे देश का
लोग करते है चिंतन मनन नींद में
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गाली को प्रणाम समझना पड़ता है
मधुशाला को धाम समझना पड़ता है
मधुशाला को धाम समझना पड़ता है
आधुनिक कहलाने की अंधी जिद में
रावण को भी राम समझना पड़ता है
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हुआ ही क्या जो वो हमें मिला नहीं
बदन ही सिर्फ़ एक रास्ता नहीं
बदन ही सिर्फ़ एक रास्ता नहीं
ये पहला इश्क़ है तुम्हारा सोच लो
मेरे लिए ये रास्ता नया नहीं
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एक मुद्दत से हैं सफ़र में हम
घर में रह कर भी जैसे बेघर से
घर में रह कर भी जैसे बेघर से
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घुटन सी होने लगी उस के पास जाते हुए
मैं ख़ुद से रूठ गया हूँ उसे मनाते हुए
मैं ख़ुद से रूठ गया हूँ उसे मनाते हुए
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ये बार-ए-ग़म भी उठाया नहीं बहुत दिन से
कि उस ने हम को रुलाया नहीं बहुत दिन से
कि उस ने हम को रुलाया नहीं बहुत दिन से
चलो कि ख़ाक उड़ाएँ चलो शराब पिएँ
किसी का हिज्र मनाया नहीं बहुत दिन से
ये कैफ़ियत है मेरी जान अब तुझे खो कर
कि हम ने ख़ुद को भी पाया नहीं बहुत दिन से
हर एक शख़्स यहाँ महव-ए-ख़्वाब लगता है
किसी ने हम को जगाया नहीं बहुत दिन से
ये ख़ौफ़ है कि रगों में लहू न जम जाए
तुम्हें गले से लगाया नहीं बहुत दिन से
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घुटन सी होने लगी उस के पास जाते हुए
मैं ख़ुद से रूठ गया हूँ उसे मनाते हुए
मैं ख़ुद से रूठ गया हूँ उसे मनाते हुए
ये ज़ख़्म ज़ख़्म मनाज़िर लहू लहू चेहरे
कहाँ चले गए वो लोग हँसते गाते हुए
न जाने ख़त्म हुई कब हमारी आज़ादी
तअल्लुक़ात की पाबंदियाँ निभाते हुए
है अब भी बिस्तर-ए-जाँ पर तिरे बदन की शिकन
मैं ख़ुद ही मिटने लगा हूँ उसे मिटाते हुए
तुम्हारे आने की उम्मीद बर नहीं आती
मैं राख होने लगा हूँ दिए जलाते हुए
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