gaali ko pranaam samajhna padta hai | गाली को प्रणाम समझना पड़ता है

  - Azhar Iqbal

गाली को प्रणाम समझना पड़ता है
मधुशाला को धाम समझना पड़ता है

आधुनिक कहलाने की अंधी जिद में
रावण को भी राम समझना पड़ता है

  - Azhar Iqbal

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    किसी ने हम को जगाया नहीं बहुत दिन से

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    कि हम ने ख़ुद को भी पाया नहीं बहुत दिन से
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    मैं ख़ुद ही मिटने लगा हूँ उसे मिटाते हुए
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    हर एक शख़्स यहाँ महव-ए-ख़्वाब लगता है
    किसी ने हम को जगाया नहीं बहुत दिन से
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