लगा के धड़कन में आग मेरी ब-रंग-ए-रक़्स-ए-शरर गया वो
मुझे बना के सुलगता सहरा मिरे जहाँ से गुज़र गया वो
मुझे बना के सुलगता सहरा मिरे जहाँ से गुज़र गया वो
यूँ नींद से क्यूँ मुझे जगा कर चराग़-ए-उम्मीद फिर जला कर
हुई सहर तो उसे बुझा कर हवा के जैसा गुज़र गया वो
वो रेत पर इक निशान जैसा था मोम के इक मकान जैसा
बड़ा सँभल कर छुआ था मैं ने प एक पल में बिखर गया वो
वो साथ मेरे था जैसे हर पल वो देखता था मुझे मुसलसल
ज़रा सा मौसम बदल गया तो चुरा के मुझ से नज़र गया वो
वो एक बिछड़े से मीत जैसा वो इक भुलाए से गीत जैसा
कोई पुरानी सी धुन जगा कर वजूद-ओ-दिल में उतर गया वो
वो दोस्त सारे थे चार पल के जो चल दिए हम-सफ़र बदल के
'सहाब'-ए-नादाँ वहीं खड़ा है उसी डगर पर ठहर गया वो
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रात जब टूट कर बिखर जाए
जागने वाला फिर किधर जाए
जागने वाला फिर किधर जाए
उम्र गुज़री है जैसे कानों से
सरसराती हवा गुज़र जाए
अपनी यादें भी साथ ले जा तू
ये तिरा क़र्ज़ भी उतर जाए
तेज़ चलने में गिर न जाए कहीं
वक़्त से बोल दो ठहर जाए
अब तो तू भी नहीं है धड़कन में
दिल का क्या काम अब वो मर जाए
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तिरे लबों से जो निकला था इक तबस्सुम सा
मिरे लिए तो वही गीत बन गया होगा
लिखा है आज तिरा नाम मैं ने काग़ज़ पर
ये मेरा लफ़्ज़ भी इतरा के चल रहा होगा
मिरी पलक पे है एहसास जैसे मख़मल सा
तुम्हारा ख़्वाब उसे छू के चल दिया होगा
मुझे यक़ीन है तेरे ही सुर्ख़ गालों ने
धनक को शोख़ सा ये रंग दे दिया होगा
जो देखता है तिरा हुस्न रोज़ छुप छुप कर
उस आइने को भी तो इश्क़ हो गया होगा
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इल्म आए न अगर काम किसी मुफ़्लिस के
आ के मुझ से मिरी दानाई को वापस ले ले
या तो सच कहने पे सुक़रात को मारे न कोई
या तो संसार से सच्चाई को वापस ले ले
चीख़ उट्ठे हैं मिरे घर के ये ख़ाली बर्तन
अब तो बाज़ार से महँगाई को वापस ले ले
या तो हर सम्त ये दहशत के नज़ारे न दिखा
या मिरी आँखों से बीनाई को वापस ले ले
या तो इंसान के हर ज़ख़्म को भर दे मौला
या तो दुनिया से मसीहाई को वापस ले ले
शाहिद-ए-जुर्म हो फिर भी न लहू खौल उठे
ऐसे ख़ामोश तमाशाई को वापस ले ले
बज़्म-ए-बातिल में भी हिम्मत रहे हक़-गोई की
या मिरी ताक़त-ए-गोयाई को वापस ले ले
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आप का पहला ही अंदाज़ बता देता है
आप को आप के वालिद ने सिखाया क्या है
ज़िंदगी ख़ुद पे तू इतना भी गुमाँ मत करना
चंद साँसों के सिवा तेरा असासा क्या है
फिर से इक और लड़ाई के बहाने के सिवा
तुम बता दो कि किसी जंग से मिलता क्या है
उम्र भर कुछ न किया जिस की तमन्ना के सिवा
उस ने पूछा भी नहीं मेरी तमन्ना क्या है
कुछ ग़रीबों की गली में भी दिए जल जाएँ
इस से बेहतर भी दिवाली का उजाला क्या है
कोई जज़्बा कोई एहसास न धड़कन है कोई
ये अगर दिल है मिरे दोस्त तो सहरा क्या है
दाम मन-माने उसे दे के ख़रीदा तू ने
देख तो ले तुझे बाज़ार ने बेचा क्या है
वही भूके वही आहें वही आँसू हैं 'सहाब'
शहर का नाम बदल जाने से बदला क्या है
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भूल पाए न तुझे आज भी रोने वाले
तू कहाँ है मिरी आँखों को भिगोने वाले
तू कहाँ है मिरी आँखों को भिगोने वाले
हम किसी ग़ैर के हो जाएँ ये मुमकिन ही नहीं
और तुम तो कभी अपने नहीं होने वाले
सोचते हैं कि कहाँ जा के तलाशें उन को
हम को कुछ दोस्त मिले थे कभी खोने वाले
रेत के जैसा है अब तो ये मुक़द्दर मेरा
ख़ुद बिखर जाएँगे अब मुझ को पिरोने वाले
दर्द और अश्क ज़माने में अज़ल से हैं वही
सिर्फ़ बदले हैं हर इक दौर में रोने वाले
पेड़ को अपना ही साया नहीं मिलता लोगों
फ़स्ल अपनी कभी पाते नहीं बोने वाले
दर्द ग़ैरों का भला कौन उठाता है 'सहाब'
सब यहाँ ख़ुद की सलीबों को हैं ढोने वाले
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हम भी गुज़र गए यहाँ कुछ पल गुज़ार के
रातें थीं क़र्ज़ की यहाँ दिन थे उधार के
रातें थीं क़र्ज़ की यहाँ दिन थे उधार के
जैसे पुराना हार था रिश्ता तेरा मेरा
अच्छा किया जो रख दिया तू ने उतार के
दिल में हज़ार दर्द हों आँसू छुपा के रख
कोई तो कारोबार हो बिन इश्तिहार के
क्या जाने अब भी दर्द को क्यूँ है मेरी तलाश
टुकड़े भी अब कहाँ बचे इस के शिकार के
शायद ज़बाँ पे क़र्ज़ था हम ने चुका दिया
ख़ामोश हो गए हैं तुझे हम पुकार के
ऐसे सुलग उठा तेरी यादों से दिल मेरा
जैसे धधक उठें कहीं जंगल चिनार के
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मुझ से बिछड़ के रेत सा वो भी बिखर गया
उस जाने वाले शख़्स को जाने से क्या मिला
अब भी मिरे वजूद में हर साँस में वही
मैं सोचता हूँ उस को भुलाने से क्या मिला
तू क्या गया कि दिल मिरा ख़ामोश हो गया
इन धड़कनों के शोर मचाने से क्या मिला
अपने ही एक दर्द का चारा न कर सके
सारे जहाँ का दर्द उठाने से क्या मिला
जिस के लिए लिखा उसे वो तो न सुन सका
वो गीत महफ़िलों को सुनाने से क्या मिला
उन का हर एक हर्फ़ है दिल पर लिखा हुआ
उस दोस्त के ख़तों को जलाने से क्या मिला
सोचो ज़रा कि तुम ने ज़माने को क्या दिया
क्यूँ सोचते हो तुम को ज़माने से क्या मिला
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यूँ ही हर बात पे हँसने का बहाना आए
फिर वो मा'सूम सा बचपन का ज़माना आए
फिर वो मा'सूम सा बचपन का ज़माना आए
काश लौटें मिरे पापा भी खिलौने ले कर
काश फिर से मिरे हाथों में ख़ज़ाना आए
काश दुनिया की भी फ़ितरत हो मिरी माँ जैसी
जब मैं बिन बात के रूठूँ तो मनाना आए
हम को क़ुदरत ही सिखा देती है कितनी बातें
काश उस्तादों को क़ुदरत सा पढ़ाना आए
आह सहसा कभी स्कूल से छुट्टी जो मिले
चीख़ कर बच्चों का वो शोर मचाना आए
आज बचपन कहीं बस्तों में ही उलझा है 'सहाब'
फिर वो तितली को पकड़ना वो उड़ाना आए
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जब भी मिलते हैं तो जीने की दुआ देते हैं
जाने किस बात की वो हम को सज़ा देते हैं
जाने किस बात की वो हम को सज़ा देते हैं
हादसे जान तो लेते हैं मगर सच ये है
हादसे ही हमें जीना भी सिखा देते हैं
रात आई तो तड़पते हैं चराग़ों के लिए
सुब्ह होते ही जिन्हें लोग बुझा देते हैं
होश में हो के भी साक़ी का भरम रखने को
लड़खड़ाने की हम अफ़्वाह उड़ा देते हैं
क्यूँ न लौटे वो उदासी का मुसाफ़िर यारो
ज़ख़्म सीने के उसे रोज़ सदा देते हैं
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