हम भी गुज़र गए यहाँ कुछ पल गुज़ार के

रातें थीं क़र्ज़ की यहाँ दिन थे उधार के

जैसे पुराना हार था रिश्ता तेरा मेरा
अच्छा किया जो रख दिया तू ने उतार के

दिल में हज़ार दर्द हों आँसू छुपा के रख
कोई तो कारोबार हो बिन इश्तिहार के

क्या जाने अब भी दर्द को क्यूँ है मेरी तलाश
टुकड़े भी अब कहाँ बचे इस के शिकार के

शायद ज़बाँ पे क़र्ज़ था हम ने चुका दिया
ख़ामोश हो गए हैं तुझे हम पुकार के

ऐसे सुलग उठा तेरी यादों से दिल मेरा
जैसे धधक उठें कहीं जंगल चिनार के

— Ajay Sahaab

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