वो माहताब भी ख़ुशबू से भर गया होगा

जो चाँदनी ने तिरी ज़ुल्फ़ को छुआ होगा

तिरे लबों से जो निकला था इक तबस्सुम सा
मिरे लिए तो वही गीत बन गया होगा

लिखा है आज तिरा नाम मैं ने काग़ज़ पर
ये मेरा लफ़्ज़ भी इतरा के चल रहा होगा

मिरी पलक पे है एहसास जैसे मख़मल सा
तुम्हारा ख़्वाब उसे छू के चल दिया होगा

मुझे यक़ीन है तेरे ही सुर्ख़ गालों ने
धनक को शोख़ सा ये रंग दे दिया होगा

जो देखता है तिरा हुस्न रोज़ छुप छुप कर
उस आइने को भी तो इश्क़ हो गया होगा

— Ajay Sahaab

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