Amir Ameer

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    ''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ''

    चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ
    जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए
    बस अश्क कहूँ तो एक आँसू
    तेरे गोरे गाल को धो जाए
    मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए
    मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे
    मेरे शाने पर सर रक्खे तू
    मैं नींद कहूँ तू सो जाए
    मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ
    तेरे होंठों पर मुस्कान आए
    मैं दिल लिक्खूँ तू दिल थामे
    मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए
    तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से
    फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ
    कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँ
    कुछ सीधा उल्टा हो जाए
    मैं आह लिखूँ तू हाय करे
    बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू
    फिर बेचैन का बे काटूँ
    तुझे चैन ज़रा सा हो जाए
    अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे
    फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े
    जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो
    मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

    Amir Ameer
    10
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    प्यार की हर इक रस्म कि जो मतरूक थी मैं ने जारी की
    इश्क़-लबादा तन पर पहना और मोहब्बत तारी की

    मैं अब शहर-ए-इश्क़ में कुछ क़ानून बनाने वाला हूँ
    अब उस उस की ख़ैर नहीं है जिस जिस ने ग़द्दारी की

    पहले थोड़ी बहुत मोहब्बत की कि कैसी होती है
    पर जब असली चेहरा देखा मैं ने तो फिर सारी की

    जो भी मुड़ कर देखेगा वो पत्थर का हो जाएगा
    देखो देखो शहर में आए सन्नाटा और तारीकी

    एक जन्म में मैं उस का था एक जन्म में वो मेरा
    हम ने की हर बार मोहब्बत लेकिन बारी बारी की

    हम सा हो तो सामने आए आदिल और इंसाफ़-पसंद
    दुश्मन को भी ख़ून रुलाया यारों से भी यारी की

    ऐसा प्यार था हम दोनों में कि बरसों ला-इल्म रहे
    उस ने भी किरदार निभाया मैं ने भी फ़नकारी की

    बात तो इतनी सी है वापस जाने को मैं आया था
    साँस उठाई उम्र समेटी चलने की तय्यारी की

    Amir Ameer
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    हुस्न तेरा ग़ुरूर मेरा था
    सच तो ये है क़ुसूर मेरा था

    रात यूँ तेरे ख़्वाब से गुज़रा
    कि बदन चूर चूर मेरा था

    आइने में जमाल था तेरा
    तेरे चेहरे पे नूर मेरा था

    आँख की हर ज़बान पर कल तक
    बोलने में उबूर मेरा था

    उस की बातों में नाम मेरा न था
    ज़िक्र बैनस्सुतूर मेरा था

    एक ही वक़्त में जुनून-ओ-ख़िरद
    ला-शुऊ'र-ओ-शुऊ'र मेरा था

    Amir Ameer
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    ये मेरा अक्स जो ठहरा तिरी निगाह में है
    नहीं है प्यार तो फिर क्या तिरी सलाह में है

    नहीं है वक़्त की जुरअत कि छू सके उस को
    ये तेरा हुस्न कि जब तक मिरी पनाह में है

    नज़र जो तुझ पे रुके तो ज़रा नहीं सुनती
    कहाँ सवाब में है ये कहाँ गुनाह में है

    ज़बाँ सँभाल के अब नाम ले रक़ीब उस का
    जो तेरा प्यार था वो अब मिरे निकाह में है

    Amir Ameer
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    ये लाल डिबिया में जो पड़ी है वो मुँह दिखाई पड़ी रहेगी
    जो मैं भी रूठा तो सुब्ह तक तू सजी सजाई पड़ी रहेगी

    न तू ने पहने जो अपने हाथों में मेरी इन उँगलियों के कंगन
    तो सोच ले कितनी सूनी सूनी तिरी कलाई पड़ी रहेगी

    हमारे घर से यूँ भाग जाने पे क्या बनेगा मैं सोचता हूँ
    मोहल्ले-भर में कई महीनों तलक दहाई पड़ी रहेगी

    जहाँ पे कप के किनारे पर एक लिपस्टिक का निशान होगा
    वहीं पे इक दो क़दम की दूरी पे एक टाई पड़ी रहेगी

    हर एक खाने से पहले झगड़ा खिलाएगा कौन पहले लुक़्मा
    हमारे घर में तो ऐसी बातों से ही लड़ाई पड़ी रहेगी

    और अब मिठाई की क्या ज़रूरत मैं तुझ से मिल-जुल के जा रहा हूँ
    मगर है अफ़्सोस तेरे हाथों की रस मलाई पड़ी रहेगी

    मुझे तो ऑफ़िस के आठ घंटों से होल आता है सोच कर ये
    हमारे माबैन रोज़ बरसों की ये जुदाई पड़ी रहेगी

    जो मेरी मानो तो मेरे ऑफ़िस मैं कोई मर्ज़ी की जॉब कर लो
    कि हम ने क्या काम-वाम करना है कारवाई पड़ी रहेगी

    हमारे सपने कुछ इस तरह से जगाए रखेंगे रात सारी
    कि दिन चढ़े तक तो मेरी बाहोँ में कसमसाई पड़ी रहेगी

    इस एक बिस्तर पे आज कोई नई कहानी जन्म न ले ले
    अगर यूँ ही इस पे सिलवटों से भरी रज़ाई पड़ी रहेगी

    मिरी मोहब्बत के तीन दर्जे हैं सहल मुश्किल या ग़ैर-मुमकिन
    तो एक हिस्सा ही झेल पाएगी दो तिहाई पड़ी रहेगी

    Amir Ameer
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    वो रूठी रूठी ये कह रही थी क़रीब आओ मुझे मनाओ
    हो मर्द तो आगे बढ़ के मुझ को गले लगाओ मुझे मनाओ

    मैं कल से नाराज़ हूँ क़सम से और एक कोने में जा पड़ी हूँ
    हाँ मैं ग़लत हूँ दिखाओ फिर भी तुम्ही झुकाओ मुझे मनाओ

    तुम्हारे नख़रों से अपनी अन-बन तो बढ़ती जाएगी सुन रहे हो
    तुम एक सॉरी से ख़त्म कर सकते हो तनाव मुझे मनाओ

    तुम्हें पता भी है किस सखी से तुम्हारा पाला पड़ा हुआ है
    मुआ'फ़ कर दूँगी तुम को फ़ौरन ही आओ आओ मुझे मनाओ

    मुझे यूँ अपने से दूर कर के न ख़ुश रहोगे ग़ुरूर कर के
    सो मुझ से कुछ फ़ासले पे रक्खो ये रख-रखाव मुझे मनाओ

    मुझे बताओ कि मेरी नाराज़गी से तुम को है फ़र्क़ कोई
    मैं खा रही हूँ न-जाने कब से ही पेच-ताव मुझे मनाओ

    मुझे पता है मुझे मनाने को तुम भी बेचैन हो रहे हो
    तो क्या ज़रूरी है तुम भी इतने भरम दिखाओ मुझे मनाओ

    मिरा इरादा तो पहले ही से है मान जाने का सच बताऊँ
    तुम अपने भर भी तमाम हर्बों को आज़माओ मुझे मनाओ

    बहुत बुरे हो मिरी दिखावे की नींद को भी तुम अस्ल समझे
    कहीं से सीखो पियार करना मुझे जगाओ मुझे मनाओ

    तुम अपने अंदाज़ में कि जैसे चढ़ा के रखते हो आस्तीनें
    तो मैं ''तुम्हारा'' रदीफ़ वाली ग़ज़ल सुनाओ मुझे मनाओ

    ख़िलाफ़-ए-मा'मूल मूड अच्छा है आज मेरा मैं कह रही हूँ
    कि फिर कभी मुझ से करते रहना ये भाव-ताव मुझे मनाओ

    मैं परले दर्जे का हट-धरम था कि फिर भी उस को मना न पाया
    सो अब भी कानों में गूँजता है मुझे मनाओ मुझे मनाओ

    Amir Ameer
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    बजाए कोई शहनाई मुझे अच्छा नहीं लगता
    मोहब्बत का तमाशाई मुझे अच्छा नहीं लगता

    वो जब बिछड़े थे हम तो याद है गर्मी की छुट्टीयाँ थीं
    तभी से माह जुलाई मुझे अच्छा नहीं लगता

    वो शरमाती है इतना कि हमेशा उस की बातों का
    क़रीबन एक चौथाई मुझे अच्छा नहीं लगता

    न-जाने इतनी कड़वाहट कहाँ से आ गई मुझ में
    करे जो मेरी अच्छाई मुझे अच्छा नहीं लगता

    मिरे दुश्मन को इतनी फ़ौक़ियत तो है बहर-सूरत
    कि तू है उस की हम-साई मुझे अच्छा नहीं लगता

    न इतनी दाद दो जिस में मिरी आवाज़ दब जाए
    करे जो यूँ पज़ीराई मुझे अच्छा नहीं लगता

    तिरी ख़ातिर नज़र-अंदाज़ करता हूँ उसे वर्ना
    वो जो है ना तिरा भाई मुझे अच्छा नहीं लगता

    Amir Ameer
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    इश्क़ मैं ने लिख डाला क़ौमीयत के ख़ाने में
    और तेरा दिल लिखा शहरियत के ख़ाने में

    मुझ को तजरबों ने ही बाप बन के पाला है
    सोचता हूँ क्या लिखूँ वलदियत के ख़ाने में

    मेरा साथ देती है मेरे साथ रहती है
    मैं ने लिखा तन्हाई ज़ाैजियत के ख़ाने में

    दोस्तों से जा कर जब मशवरा किया तो फिर
    मैं ने कुछ नहीं लिखा हैसियत के ख़ाने में

    इम्तिहाँ मोहब्बत का पास कर लिया मैं ने
    अब यही मैं लिखूँगा अहलियत के ख़ाने में

    जब से आप मेरे हैं फ़ख़्र से मैं लिखता हूँ
    नाम आप का अपनी मिलकियत के ख़ाने में

    Amir Ameer
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    तुझ को अपना के भी अपना नहीं होने देना
    ज़ख़्म-ए-दिल को कभी अच्छा नहीं होने देना

    मैं तो दुश्मन को भी मुश्किल में कुमक भेजूँगा
    इतनी जल्दी उसे पसपा नहीं होने देना

    तू ने मेरा नहीं होना है तो फिर याद रहे
    मैं ने तुझ को भी किसी का नहीं होने देना

    तू ने कितनों को नचाया है इशारों पे मगर
    मैं ने ऐ इश्क़! ये मुजरा नहीं होने देना

    उस ने खाई है क़सम फिर से मुझे भूलने की
    मैं ने इस बार भी ऐसा नहीं होने देना

    ज़िंदगी में तो तुझे छोड़ ही देता लेकिन
    फिर ये सोचा तुझे बेवा नहीं होने देना

    मज़हब-ए-इश्क़ कोई छोड़ मरे तो मैं ने
    ऐसे मुर्तद का जनाज़ा नहीं होने देना

    Amir Ameer
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    अगर ये कह दो बग़ैर मेरे नहीं गुज़ारा तो मैं तुम्हारा
    या उस पे मब्नी कोई तअस्सुर कोई इशारा तो मैं तुम्हारा

    ग़ुरूर-परवर अना का मालिक कुछ इस तरह के हैं नाम मेरे
    मगर क़सम से जो तुम ने इक नाम भी पुकारा तो मैं तुम्हारा

    तुम अपनी शर्तों पे खेल खेलो मैं जैसे चाहे लगाऊँ बाज़ी
    अगर मैं जीता तो तुम हो मेरे अगर मैं हारा तो मैं तुम्हारा

    तुम्हारा आशिक़ तुम्हारा मुख़्लिस तुम्हारा साथी तुम्हारा अपना
    रहा न इन में से कोई दुनिया में जब तुम्हारा तो मैं तुम्हारा

    तुम्हारा होने के फ़ैसले को मैं अपनी क़िस्मत पे छोड़ता हूँ
    अगर मुक़द्दर का कोई टूटा कभी सितारा तो मैं तुम्हारा

    ये किस पे ता'वीज़ कर रहे हो ये किस को पाने के हैं वज़ीफ़े
    तमाम छोड़ो बस एक कर लो जो इस्तिख़ारा तो मैं तुम्हारा

    Amir Ameer
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