Amir Ameer

Amir Ameer

@amir-ameer

Amir Ameer shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Amir Ameer's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

23

Content

21

Likes

642

Shayari
Audios
  • Sher(5)
  • Ghazal(15)
  • Nazm(1)

Sher

एक शतरंज-नुमा ज़िंदगी के ख़ानों में ऐसे हम शाह जो प्यादों के निशाने निकले — Amir Ameer
मुझ को तजरबों ने ही बाप बन के पाला है सोचता हूँ क्या लिक्खूँ वलदियत के ख़ाने में — Amir Ameer
तुम्हारा होने के फ़ैसले को मैं अपनी क़िस्मत पे छोड़ता हूँ अगर मुक़द्दर का कोई टूटा कभी सितारा तो मैं तुम्हारा — Amir Ameer
वो शरमाती है इतना कि हमेशा उस की बातों का क़रीबन एक चौथाई मुझे अच्छा नहीं लगता — Amir Ameer
उस ने खाई है क़सम फिर से मुझे भूलने की मैं ने इस बार भी ऐसा नहीं होने देना — Amir Ameer

Ghazal

प्यार की हर इक रस्म कि जो मतरूक थी मैं ने जारी की इश्क़-लबादा तन पर पहना और मोहब्बत तारी की मैं अब शहर-ए-इश्क़ में कुछ क़ानून बनाने वाला हूँ अब उस उस की ख़ैर नहीं है जिस जिस ने ग़द्दारी की पहले थोड़ी बहुत मोहब्बत की कि कैसी होती है पर जब असली चेहरा देखा मैं ने तो फिर सारी की जो भी मुड़ कर देखेगा वो पत्थर का हो जाएगा देखो देखो शहर में आए सन्नाटा और तारीकी एक जन्म में मैं उस का था एक जन्म में वो मेरा हम ने की हर बार मोहब्बत लेकिन बारी बारी की हम सा हो तो सामने आए आदिल और इंसाफ़-पसंद दुश्मन को भी ख़ून रुलाया यारों से भी यारी की ऐसा प्यार था हम दोनों में कि बरसों ला-इल्म रहे उस ने भी किरदार निभाया मैं ने भी फ़नकारी की बात तो इतनी सी है वापस जाने को मैं आया था साँस उठाई उम्र समेटी चलने की तय्यारी की — Amir Ameer
न ग़ौर से देख मेरे दिल का कबाड़ ऐसे कि मैं कभी भी नहीं रहा था उजाड़ ऐसे बुरा हो तेरा जो बंद रखे थे मैं ने घर के तो खोल आया बग़ैर पूछे किवाड़ ऐसे जो मेरी रूह-ओ-बदन के टाँके उधेड़ डाले तो मेरी नज़रों पे अपनी नज़रों को गाड़ ऐसे समझ न पाया कि तोड़ देता या साथ रखता कि इस तअ'ल्लुक़ में आ गई थी दराड़ ऐसे ऐ इश्क़ रह जाऊँ फड़फड़ा के यूँँ कर दे बे-बस सो मेरी गर्दन में अपने दाँतों को गाड़ ऐसे तो मेरी आदत से मेरी फ़ितरत ही हो चला है अभी भी कहता हूँ मुझ को तू न बिगाड़ ऐसे ये मेरे बाज़ू ही जंग का फ़ैसला करेंगे पकड़ ले तलवार और मुझ को पछाड़ ऐसे तुम्हारे ग़म का पहाड़ टूटा तो फिर ये जाना पहाड़ों पर ही तो टूटते हैं पहाड़ ऐसे हज़ार मिन्नत हज़ार मिन्नत हज़ार मेहनत तुझे मनाने को कर रहा हूँ जुगाड़ ऐसे — Amir Ameer
तस्वीर तेरी यूँँ ही रहे काश जेब में गोया कि हुस्न-ए-वादी-ए-कैलाश जेब में रस्ते में मुझ को मिल गया यूँँ ही गिरा-पड़ा मैं ने उठा के रख लिया आकाश जेब में पंद्रह मिनट से ढूँड रहा है न जाने क्या डाले हुए है हाथ को क़ल्लाश जेब में आ जा कि यार पान के खोखे पे जम्अ'' हैं सिगरेट छुपा के हाथ में और ताश जेब सब टेंट और कुर्सियों वाले कमा गए शाइ'र ने ठूँस कर भरी शाबाश जेब में अब उस ग़रीब चोर को भेजोगे जेल क्यूँँ ग़ुर्बत की जिस ने काट ली पादाश जेब में रखता नहीं हूँ पास में अपनी कभी शनाख़्त फिरता है कौन ले के कभी लाश जेब में — Amir Ameer
वो भी अब याद करें किस को मनाने निकले हम भी यूँँही तो न माने थे सियाने निकले मैं ने महसूस किया जब भी कि घर से निकला और भी लोग कई कर के बहाने निकले आज की बात पे मैं हँसता रहा हँसता रहा चोट ताज़ा जो लगी दर्द पुराने निकले एक शतरंज-नुमा ज़िंदगी के ख़ानों में ऐसे हम शाह जो प्यादों के निशाने निकले तू ने जिस शख़्स को मारा था समझ कर काफ़िर उस की मुट्ठी से तो तस्बीह के दाने निकले काश हो आज कुछ ऐसा वो मिरा मालिक-ए-दिल मेरे दिल से ही मिरे दिल को चुराने निकले आप का दर्द इन आँखों से छलकता कैसे मेरे आँसू तो पियाज़ों के बहाने निकले मैं समझता था तुझे एक ज़माने का मगर तेरे अंदर तो कई और ज़माने निकले लापता आज तलक क़ाफ़िले सारे हैं 'अमीर' जो तिरे प्यार में खो कर तुझे पाने निकले — Amir Ameer
वो रूठी रूठी ये कह रही थी क़रीब आओ मुझे मनाओ हो मर्द तो आगे बढ़ के मुझ को गले लगाओ मुझे मनाओ मैं कल से नाराज़ हूँ क़सम से और एक कोने में जा पड़ी हूँ हाँ मैं ग़लत हूँ दिखाओ फिर भी तुम्हीं झुकाओ मुझे मनाओ तुम्हारे नख़रों से अपनी अन-बन तो बढ़ती जाएगी सुन रहे हो तुम एक सॉरी से ख़त्म कर सकते हो तनाव मुझे मनाओ तुम्हें पता भी है किस सखी से तुम्हारा पाला पड़ा हुआ है मुआ'फ़ कर दूँगी तुम को फ़ौरन ही आओ आओ मुझे मनाओ मुझे यूँँ अपने से दूर कर के न ख़ुश रहोगे ग़ुरूर कर के सो मुझ से कुछ फ़ासले पे रक्खो ये रख-रखाव मुझे मनाओ मुझे बताओ कि मेरी नाराज़गी से तुम को है फ़र्क़ कोई मैं खा रही हूँ न-जाने कब से ही पेच-ताव मुझे मनाओ मुझे पता है मुझे मनाने को तुम भी बेचैन हो रहे हो तो क्या ज़रूरी है तुम भी इतने भरम दिखाओ मुझे मनाओ मिरा इरादा तो पहले ही से है मान जाने का सच बताऊँ तुम अपने भर भी तमाम हर्बों को आज़माओ मुझे मनाओ बहुत बुरे हो मिरी दिखावे की नींद को भी तुम अस्ल समझे कहीं से सीखो पियार करना मुझे जगाओ मुझे मनाओ तुम अपने अंदाज़ में कि जैसे चढ़ा के रखते हो आस्तीनें तो मैं ''तुम्हारा'' रदीफ़ वाली ग़ज़ल सुनाओ मुझे मनाओ ख़िलाफ़-ए-मा'मूल मूड अच्छा है आज मेरा मैं कह रही हूँ कि फिर कभी मुझ से करते रहना ये भाव-ताव मुझे मनाओ मैं परले दर्जे का हट-धरम था कि फिर भी उस को मना न पाया सो अब भी कानों में गूँजता है मुझे मनाओ मुझे मनाओ — Amir Ameer
बजाए कोई शहनाई मुझे अच्छा नहीं लगता मोहब्बत का तमाशाई मुझे अच्छा नहीं लगता वो जब बिछड़े थे हम तो याद है गर्मी की छुट्टीयाँ थीं तभी से माह जुलाई मुझे अच्छा नहीं लगता वो शरमाती है इतना कि हमेशा उस की बातों का क़रीबन एक चौथाई मुझे अच्छा नहीं लगता न-जाने इतनी कड़वाहट कहाँ से आ गई मुझ में करे जो मेरी अच्छाई मुझे अच्छा नहीं लगता मिरे दुश्मन को इतनी फ़ौक़ियत तो है बहर-सूरत कि तू है उस की हम-साई मुझे अच्छा नहीं लगता न इतनी दाद दो जिस में मिरी आवाज़ दब जाए करे जो यूँँ पज़ीराई मुझे अच्छा नहीं लगता तिरी ख़ातिर नज़र-अंदाज़ करता हूँ उसे वर्ना वो जो है ना तिरा भाई मुझे अच्छा नहीं लगता — Amir Ameer
तुझ को अपना के भी अपना नहीं होने देना ज़ख़्म-ए-दिल को कभी अच्छा नहीं होने देना मैं तो दुश्मन को भी मुश्किल में कुमक भेजूँगा इतनी जल्दी उसे पसपा नहीं होने देना तू ने मेरा नहीं होना है तो फिर याद रहे मैं ने तुझ को भी किसी का नहीं होने देना तू ने कितनों को नचाया है इशारों पे मगर मैं ने ऐ इश्क़! ये मुजरा नहीं होने देना उस ने खाई है क़सम फिर से मुझे भूलने की मैं ने इस बार भी ऐसा नहीं होने देना ज़िंदगी में तो तुझे छोड़ ही देता लेकिन फिर ये सोचा तुझे बेवा नहीं होने देना मज़हब-ए-इश्क़ कोई छोड़ मरे तो मैं ने ऐसे मुर्तद का जनाज़ा नहीं होने देना — Amir Ameer
ये लाल डिबिया में जो पड़ी है वो मुँह दिखाई पड़ी रहेगी जो मैं भी रूठा तो सुब्ह तक तू सजी सजाई पड़ी रहेगी न तू ने पहने जो अपने हाथों में मेरी इन उँगलियों के कंगन तो सोच ले कितनी सूनी सूनी तिरी कलाई पड़ी रहेगी हमारे घर से यूँँ भाग जाने पे क्या बनेगा मैं सोचता हूँ मोहल्ले-भर में कई महीनों तलक दहाई पड़ी रहेगी जहाँ पे कप के किनारे पर एक लिपस्टिक का निशान होगा वहीं पे इक दो क़दम की दूरी पे एक टाई पड़ी रहेगी हर एक खाने से पहले झगड़ा खिलाएगा कौन पहले लुक़्मा हमारे घर में तो ऐसी बातों से ही लड़ाई पड़ी रहेगी और अब मिठाई की क्या ज़रूरत मैं तुझ से मिल-जुल के जा रहा हूँ मगर है अफ़्सोस तेरे हाथों की रस मलाई पड़ी रहेगी मुझे तो ऑफ़िस के आठ घंटों से होल आता है सोच कर ये हमारे माबैन रोज़ बरसों की ये जुदाई पड़ी रहेगी जो मेरी मानो तो मेरे ऑफ़िस मैं कोई मर्ज़ी की जॉब कर लो कि हम ने क्या काम-वाम करना है कारवाई पड़ी रहेगी हमारे सपने कुछ इस तरह से जगाए रखेंगे रात सारी कि दिन चढ़े तक तो मेरी बाहोँ में कसमसाई पड़ी रहेगी इस एक बिस्तर पे आज कोई नई कहानी जन्म न ले ले अगर यूँँ ही इस पे सिलवटों से भरी रज़ाई पड़ी रहेगी मिरी मोहब्बत के तीन दर्जे हैं सहल मुश्किल या ग़ैर-मुमकिन तो एक हिस्सा ही झेल पाएगी दो तिहाई पड़ी रहेगी — Amir Ameer
ज़रूर उस की नज़र मुझ पे ही गड़ी हुई है मैं जिम से आ रहा हूँ आस्तीं चढ़ी हुई है मुझे ज़रा सा बुरा कह दिया तो इस से क्या वो इतनी बात पे माँ बाप से लड़ी हुई है उसे ज़रूरत-ए-पर्दा ज़रा ज़ियादा है ये वो भी जानती है जब से वो बड़ी हुई है वो मेरी दी हुई नथुनी पहन के घूमती है तभी वो इन दिनों कुछ और नक-चढ़ी हुई है मुआहिदों में लचक भी ज़रूरी होती है पर इस की सूई वहीं की वहीं अड़ी हुई है वो टाई बाँधती है और खींच लेती है ये कैसे वक़्त उसे प्यार की पड़ी हुई है ख़ुदा के वास्ते लिखते रहो कि उस ने 'अमीर' हर इक ग़ज़ल तिरी सौ सौ दफ़ा पढ़ी हुई है — Amir Ameer
अगर ये कह दो बग़ैर मेरे नहीं गुज़ारा तो मैं तुम्हारा या उस पे मब्नी कोई तअस्सुर कोई इशारा तो मैं तुम्हारा ग़ुरूर-परवर अना का मालिक कुछ इस तरह के हैं नाम मेरे मगर क़सम से जो तुम ने इक नाम भी पुकारा तो मैं तुम्हारा तुम अपनी शर्तों पे खेल खेलो मैं जैसे चाहे लगाऊँ बाज़ी अगर मैं जीता तो तुम हो मेरे अगर मैं हारा तो मैं तुम्हारा तुम्हारा आशिक़ तुम्हारा मुख़्लिस तुम्हारा साथी तुम्हारा अपना रहा न इन में से कोई दुनिया में जब तुम्हारा तो मैं तुम्हारा तुम्हारा होने के फ़ैसले को मैं अपनी क़िस्मत पे छोड़ता हूँ अगर मुक़द्दर का कोई टूटा कभी सितारा तो मैं तुम्हारा ये किस पे ता'वीज़ कर रहे हो ये किस को पाने के हैं वज़ीफ़े तमाम छोड़ो बस एक कर लो जो इस्तिख़ारा तो मैं तुम्हारा — Amir Ameer

Nazm

''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए — Amir Ameer