pyaar ki har ik rasm ki jo matrook thii main ne jaarii ki | प्यार की हर इक रस्म कि जो मतरूक थी मैं ने जारी की इश्क़-लबादा तन पर पहना और मोहब्बत तारी की

  - Amir Ameer

प्यार की हर इक रस्म कि जो मतरूक थी मैं ने जारी की इश्क़-लबादा तन पर पहना और मोहब्बत तारी की

मैं अब शहर-ए-इश्क़ में कुछ क़ानून बनाने वाला हूँ
अब उस उस की ख़ैर नहीं है जिस जिस ने ग़द्दारी की

पहले थोड़ी बहुत मोहब्बत की कि कैसी होती है
पर जब असली चेहरा देखा मैं ने तो फिर सारी की

जो भी मुड़ कर देखेगा वो पत्थर का हो जाएगा
देखो देखो शहर में आए सन्नाटा और तारीकी

एक जन्म में मैं उस का था एक जन्म में वो मेरा
हम ने की हर बार मोहब्बत लेकिन बारी बारी की

हम सा हो तो सामने आए आदिल और इंसाफ़-पसंद
दुश्मन को भी ख़ून रुलाया यारों से भी यारी की

ऐसा प्यार था हम दोनों में कि बरसों ला-इल्म रहे
उस ने भी किरदार निभाया मैं ने भी फ़नकारी की

बात तो इतनी सी है वापस जाने को मैं आया था
साँस उठाई 'उम्र समेटी चलने की तय्यारी की

  - Amir Ameer

Valentine Shayari

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