मुँह में महँगा क़िवाम घुलता हो
और फिर उस पे उर्दू लहजा भी
और फिर उस पे उर्दू लहजा भी
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ये काफ़ी है कि हम इक दूसरे पर मरते हैं 'अशरफ़'
मोहब्बत साथ जीने का तक़ाज़ा तो नहीं करती
मोहब्बत साथ जीने का तक़ाज़ा तो नहीं करती
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वही सब लोग 'अशरफ़' आस्तीं के साँप निकले हैं
जिन्हें शामिल समझते थे तुम अपने ख़ैर-ख़्वाहों में
जिन्हें शामिल समझते थे तुम अपने ख़ैर-ख़्वाहों में
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नहीं करेंगे तुझे याद एक मुद्दत तक
करेंगे याद तो फिर याद करते जाएँगे
करेंगे याद तो फिर याद करते जाएँगे
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इश्क़ नासूर बन गया है अब
कुछ नहीं फ़ायदा दवा कर के
कुछ नहीं फ़ायदा दवा कर के
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