Nadeem Fazli

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Nadeem Fazli shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Nadeem Fazli's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
जनम जनम की तकान होती न बाल-ओ-पर में
जो चंद लम्हे गुज़ार लेता तरी नज़र में

चले हो घर से तो काम आएँगे साथ ले लो
वफ़ा की ख़ुशबू वफ़ा का साया कड़े सफ़र में

रिवायतों से गुरेज़ कैसा चलो जगाएँ
नसीब सोया हुआ है अपना इसी खंडर में

ग़ज़ब का सूद-ओ-ज़ियाँ है अपने मिज़ाज में अब
बला की ठंडक उतर चक्की है रग-ए-शरर में

कभी तो सारा जहान हम को लगा है अपना
कभी नज़र आए अजनबी से ख़ुद अपने घर में

गल और तितली पे तब्सिरा क्या 'नदीम' करते
बुझे होए दिल जले मकानात थे नज़र में
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Nadeem Fazli
मरहला अब के दिगर है आइने के सामने
मो'तबर ना-मो'तबर है आइने के सामने

आज शायद आईने का झूट पकड़ा जाएगा
आज वह साहब-नज़र है आइने के सामने

धुँद में डूबे होए सारे मनाज़िर देख कर
आइने की आँख तर है आइने के सामने

झुर्रियाँ चेहरे की ये बचपन की वह मासूमियत
एक लम्हे का सफ़र है आइने के सामने

हर नफ़स बे-चेहरगी का कर्ब कब तक झेलता
अब नई सम्त-ए-सफ़र है आइने के सामने

कौन है जो अपने चेहरे से नहीं डरता 'नदीम'
कौन बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर है आइने के सामने
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Nadeem Fazli
राज़-ए-फ़ितरत से अयाँ हो कोई मंज़र कोई धुन
साज़-ए-हस्ती से भी निकले कोई पैकर कोई धुन

मैं वो आवाज़ जो अब तक है समाअ'त से परे
मैं वो नग़्मा अभी उतरी नहीं जिस पर कोई धुन

इक ग़ज़ल छेड़ के रोता रहा मुझ में कोई
इक समाँ बाँध के हँसती रही मुझ पर कोई धुन

ऊँघने लगती है जब पाँव के छालों की तपक
छेड़ देते हैं मिरी राह के पत्थर कोई धुन

अक़्ल फ़रमान सुनाती रही टूटा न जुमूद
रक़्स-ए-वहशत का तक़ाज़ा था मुकर्रर कोई धन

वक़्त की लय से हम-आहंग जो होता हूँ नदीम
बैन करती है कहीं रूह के अंदर कोई धुन
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Nadeem Fazli
वो यक-ब-यक उसे दल में उतारने का अमल
वो अपनी ज़ात पे शब-ख़ून मारने का अमल

हज़ार वसवसे दिल में और इक दहकता अलाव
हयात-ए-दश्त में रातें गुज़ारने का अमल

बस एक ख़ोशा-ए-गंदुम और ऐसी दर-ब-दरी
वो आसमाँ को ज़मीं पर उतारने का अमल

ये उमर मेज़ है गवय्या क़िमार-ख़ाने की
बस एक जीत की ख़्वाहिश में हारने का अमल

वो बंद ख़ुशबू का बाद-ए-सबा के वो नाख़ुन
कली के जिस्म से कपड़े उतारने का अमल

ग़ज़ब का शोर मचाते होए ये सन्नाटे
वो बे-सदा भी किसी को पुकारने का अमल

हुइ है शाम फिर अश्कों से इक वज़ू हो 'नदीम'
फिर एक रात सितारे शुमारने का अमल
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Nadeem Fazli
रात की ज़ुल्फ़ कहीं ता-ब-कमर खुल जाए
हम पे भी चाँद सितारों की डगर खुल जाए

थक गई नींद मिरे ख़्वाब को ढोते ढोते
क्या तअज्जुब है मिरी आँख अगर खुल जाए

मेरा सरमाया मिरे पावँ के छालों की तपक
रास्ते में ही न सब ज़ाद-ए-सफ़र खुल जाए

आज दरिया नहीं कूज़े में समाने वाला
वक़्त है मुझ पे मिरा ज़ोम-ए-हुनर खुल जाए

सब मुसाफ़िर हैं नई राह की सब को है तलाश
सब पे मुमकिन तो नहीं राह-ए-दिगर खुल जाए

अपनी तन्हाई में महबूस हूँ मुद्दत से 'नदीम'
तू अगर साथ हो दीवार में दर खुल जाए
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Nadeem Fazli
हमीं पे तंग ये वक़्त-ए-रवाँ हुआ तो क्या
दराज़ और भी कार-ए-जहाँ हुआ तो क्या

ये सुर्ख़ तलवे ये तन्हाई आख़िरी हिचकी
अब इस से आगे कोई कारवाँ हुआ तो क्या

ये रास्ते हैं बुज़ुर्गों की ख़ाक से रौशन
सो मैं भी चल के यहीं राएगाँ हुआ तो क्या

यहाँ तो शहर ही आतिश-फ़िशाँ की ज़द पर है
जो अपने सीने में थोड़ा धुआँ हुआ तो क्या

ग़ुरूर यूँ है कि उस के गदागरों में हूँ
बराए ख़ल्क़ मैं शाह-ए-जहाँ हुआ तो क्या

हमीं ने दी थी जगह उस को अपनी पलकों में
वो ज़र्रा आज जो कोह-ए-गिराँ हुआ तो क्या

जो कर सका न किसी तौर मुतमइन ख़ुद को
सवाल उठता है मोजिज़-बयाँ हुआ तो क्या

तमाम लोग समाअत से हो गए महरूम
तब अपना लहजा ग़ज़ल की ज़बाँ हुआ तो क्या

'नदीम' आँख में आँसू है सारे आलम का
वतन हमारा जो हिन्दोस्ताँ हुआ तो क्या
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Nadeem Fazli
आसमाँ इश्क़ की अज़्मत के सिवा भी कुछ है
क्या ये सहरा मिरी वहशत के सवा भी कुछ है

मूँद लूँ आँख तो बे-कार है सब रंग-ए-जहाँ
क्या मिरी चश्म-ए-इनायत के सिवा भी कुछ है

कुछ तो है जिस के बताने से हूँ क़ासिर लेकिन
अब तिरे दर्द में लज़्ज़त के सिवा भी कुछ है

मेरी आँखों से कोई उस का सरापा देखे
तब खुलेगा कि क़यामत के सिवा भी कुछ है

हर तअल्लुक़ किसी क़ीमत का तलब-गार नहीं
दिल के सौदे में तिजारत के सिवा भी कुछ है

हाँ वह इक लम्हा कि हक़-गोई पे गर्दन कट जाए
यानी ता-उम्र इबादत के सिवा भी कुछ है

हुस्न सब हुस्न-ए-तबीअ'त पे है मौक़ूफ़ 'नदीम'
या कहीं हुस्न-ए-तबीअ'त के सिवा भी कुछ है
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Nadeem Fazli
बसीरतों का नज़र एहतिराम करती है
समाअतों से ख़मोशी कलाम करती है

ख़िज़ाँ का राज़ जो आँखों पे मुन्कशिफ़ हो जाए
तो ज़र्द रुत भी बहारों का काम करती है

कहाँ का ज़र्फ़ कहाँ का वक़ार ये दुनिया
निगाह जेब पे रख कर सलाम करती है

ज़रूरतें दर-ए-शाही पे ले के जाती हैं
मिरी अना मुझे अपना ग़ुलाम करती है

हिसार-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ से निकाल दे या-रब
ये ज़िंदगी मिरा जीना हराम करती है

बुलंद-ओ-पस्त से पर्वाज़ मावरा है मिरी
ये काएनात मुझे ज़ेर-ए-दाम करती है

ख़ुदा का शुक्र कि मैं ख़ुद से आश्ना हूँ 'नदीम'
मिरी निगाह मिरा एहतिराम करती है
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Nadeem Fazli
अपनी रूदाद यूँ बयाँ हो जाए
इक पतिंगा जले धुआँ हो जाए

ख़ाक मिल जाए ख़ाक में मेरी
या सितारों में ज़ौ-फ़िशाँ हो जाए

उस की सूरत पे तब्सिरा कैसा
आइना जिस से बद-गुमाँ हो जाए

ये जहाँ ख़्वाब है मगर ऐसा
आँख मूँदें तो राएगाँ हो जाए

अपनी रुस्वाइयाँ मुझे मंज़ूर
तू अगर मेरा राज़-दाँ हो जाए

मेरी बे-ताबियाँ बयान हुईं
अब तिरे ज़ब्त का बयाँ हो जाए
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Nadeem Fazli
किसी भी रौशन ख़याल से आश्ना नहीं है
जो आप अपने जमाल से आश्ना नहीं है

उसे ख़यालों में जैसा चाहूँ तराश लूँगा
अभी नज़र ख़द्द-ओ-ख़ाल से आश्ना नहीं है

अभी तो दा'वा है उस को मुश्किल-पसंदियाें का
अभी वो कार-ए-मुहाल से आश्ना नहीं है

अभी तो मिट्टी महक उठी है नमी को पा कर
अभी वो पानी की चाल से आश्ना नहीं है

मिज़ाज हावी रहा हमेशा ज़रूरतों पर
फ़क़ीर हर्फ़-ए-सवाल से आश्ना नहीं है

ग़ज़ल बराए ग़ज़ल है तेरी 'नदीम' अभी तू
ग़ज़ल के हुस्न-ओ-जमाल से आश्ना नहीं है
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Nadeem Fazli
अजीब जंग-ओ-जिदाल हर पल है मेरे अंदर
कि नूर-ओ-ज़ुल्मत का एक मक़्तल है मेरे अंदर

उगे हैं मुझ में हज़ार-हा ख़ार-ज़ार पौदे
फिर इस पे तुर्रा कि रूह मलमल है मेरे अंदर

ये कैसी बे-मअ'नी ज़िंदगी हो के रह गई है
न कुछ अधूरा न कुछ मुकम्मल है मेरे अंदर

मैं जानता हूँ कि ख़त्म होगा न ये तअफ़्फ़ुन
मगर लुटाऊँगा जितना संदल है मेरे अंदर

समुंदरों में कहाँ तमव्वुज है ऐसा मुमकिन
कि जो तलातुम है जैसी हलचल है मेरे अंदर

बड़े-बड़ों को समझ रहा है जो तिफ़्ल-ए-मकतब
'नदीम' आख़िर वो कौन पागल है मेरे अंदर
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Nadeem Fazli
कहाँ कोई ख़ज़ाना चाहता हूँ
ज़रा सा मुस्कुराना चाहता हूँ

मुझे मौजें उछाले जा रही हैं
मैं कब से डूब जाना चाहता हूँ

जो पुरखों का सुनहरा कल यही है
तो वापस लौट जाना चाहता हूँ

कोई दिल हो किराए का मकाँ है
मैं अब ज़ाती ठिकाना चाहता हूँ

ख़ुदा मेरी अना महफ़ूज़ रक्खे
मैं दो रोटी कमाना चाहता हूँ

जो तू आए बिसात-ए-ज़िंदगी पर
तो ख़ुद को हार जाना चाहता हूँ
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Nadeem Fazli
दिल की राहें रौशन करते रहते हैं
किस के घुंघरू छन-छन करते रहते हैं

दुनिया जिस की खोज में पागल फिरती है
हम तो उस के दर्शन करते रहते हैं

इन्दर की बे-रंगी शायद छुप जाए
बाहर रंग-ओ-रोग़न करते रहते हैं

उन से पूछो आने वाली रुत का हाल
जो पतझड़ को सावन करते रहते हैं

उन के दिल में घर कर लेना मुश्किल है
चट्टानों में रौज़न करते रहते हैं

चुप रहते हैं जिन में कुछ भी होता है
ख़ाली डब्बे खन-खन करते रहते हैं
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Nadeem Fazli
मुश्किलें ख़ाल ख़ाल चाहते हैं
शौक़ में ए'तिदाल चाहते हैं

कट के अपनी जड़ों से कुछ पौदे
सब्ज़ मौसम की शाल चाहते हैं

कम से कम ख़ुद से तो हैं मुख़्लिस वो
जो हमें हस्ब-ए-हाल चाहते हैं

लाख जीना हराम हो हम पर
हम तो रिज़्क़-ए-हलाल चाहते हैं

क्या कमी आ गई है चाहत में
ज़ख़्म क्यूँ इंदिमाल चाहते हैं

आँख पथरा गई है रो रो कर
अश्क अपना निकाल चाहते हैं

चंद लम्हात सुर्ख़-रूई के
कितने ही माह-ओ-साल चाहते हैं

घर के जल्वे 'नदीम' कम तो नहीं
इक ज़रा देख-भाल चाहते हैं
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Nadeem Fazli
हर एक बात किसी बात पर है गोया तंज़
मिरी ज़बान मिरी ज़ात पर है गोया तंज़

न वो ख़ुलूस की गर्मी न वालेहाना-पन
किसी से मिलना मुलाक़ात पर है गोया तंज़

निगाह-ए-आदम-ए-ख़ाकी की वुसअतों का बयाँ
तमाम अर्ज़-ओ-समावात पर है गोया तंज़

अजीब शख़्स है उस की बस एक ख़ामोशी
ज़माने भर की ख़ुराफ़ात पर है गोया तंज़

किसी के हाथ पे बैअत न कर सका मैं 'नदीम'
सो अपना हाथ मिरे हात पर है गोया तंज़
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Nadeem Fazli
यूँ ख़ुश-गुमान रक्खा गया उमर भर मुझे
हर शाम से मली है नवेद-ए-सहर मुझे

मैं था जो हद्द-ए-जिस्म से आगे न बढ़ सका
वह ले गया बदन से मिरे छीन कर मुझे

मैं ज़ाएअ' हो चुका हूँ बहुत खेल खेल में
ऐ वक़्त अब न और लगा दाव पर मुझे

मेरे लिए क़ज़ा है अभी दाइमी हयात
कुछ लोग चाहते हैं अभी टूट कर मुझे

होना है मो'तबर मुझे अपनी निगाह में
कब ए'तिबार बख़्शेगी तेरी नज़र मुझे

मेरी तरह 'नदीम' उसे हिचकियाँ न आएँ
जो सोचता है रात कै पिछले पहर मुझे
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Nadeem Fazli
सब को ये फ़िक्र हाथ से अब एक पल न जाए
दुनिया हुदूद-ए-वक़्त से आगे निकल न जाए

सब को फ़रेब दे मगर इतना रहे ख़याल
बहरूप भरते भरते ये चेहरा बदल न जाए

ग़म से निबाह कीजिए इस तमकनत के साथ
दिल का शरारा आँख की हद तक मचल न जाए

ज़ौक़-ए-नज़र दिया है तो ज़र्फ़-ए-नज़र भी दे
डर है मुझे शुऊर की वुसअत निगल न जाए

सुनता हूँ आप मेरी अयादत को आएँगे
करता हूँ सौ जतन कि तबीअ'त सँभल न जाए

वो दर्द है कि फट न पड़े दिल कहीं 'नदीम'
वो ख़ौफ़ है कि रीढ़ की हड्डी पिघल न जाए
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Nadeem Fazli
इक क़ुर्ब जो क़ुर्बत को रसाई नहीं देता
इक फ़ासला अहसास-ए-जुदाई नहीं देता

इक तीरगी देती है बसारत के क़रीने
इक रौशनी वो जिस में सुझाई नहीं देता

इक क़ैद है आज़ादी-ए-अफ़्कार भी गोया
इक दाम जो उड़ने से रिहाई नहीं देता

इक आह-ए-ख़ता गिर्या-ब-लब सुब्ह-ए-अज़ल से
इक दर है जो तौबा को रसाई नहीं देता

इक शौक़ बड़ाई का अगर हद से गुज़र जाए
फिर ''मैं'' के सिवा कुछ भी दिखाई नहीं देता

मत पूछिए चालाकियाँ मेरी कि मिरा ऐब
अब अहल-ए-नज़र को भी दिखाई नहीं देता
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Nadeem Fazli
मअ'रका ही मअ'रका चारों तरफ़
इक हुजूम-ए-कर्बला चारों तरफ़

तोड़ दे इस दाएरे को तोड़ दे
रास्ता है रास्ता चारों तरफ़

मुझ को कैसी ख़ामुशी दरकार थी
और कैसा शोर था चारों तरफ़

वक़्त वह जब मेरे अंदर में न था
कौन था मेरे सिवा चारों तरफ़

उमर भर मक्कार आँखों ने मुझे
वह दिखाया जो न था चारों तरफ़

अच्छे अच्छे जिस की रौ में बह गए
उस ने बाँधी वह हवा चारों तरफ़

हाए ये हम शाइरों की हाए हाए
और मुकर्रर वाह-वा चारों तरफ़
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Nadeem Fazli
आप को मुझ से ख़फ़ा मुझ से ख़फ़ा देखता हूँ
फूटती क्यूँ नहीं आँखें मिरी क्या देखता हूँ

रोज़ इस रूह की वीरानियाँ खिल उठती हैं
रोज़ इस दश्त में इक आबला-पा देखता हूँ

गुल खिलाते हैं नया रोज़ ये रिश्ते-नाते
रोज़ ही ख़ून का इक रंग नया देखता हूँ

एक सच ये है जो दुनिया को बरतने पे खुला
एक सच वो जो किताबों में लिखा देखता हूँ

आप हैं सब से जो अज़-राह-ए-ज़रूरत ही मिले
और मैं आप में भी ख़ू-ए-वफ़ा देखता हूँ

आँख भर कर मैं जिसे देख न पाया था 'नदीम'
ख़ुद को उस ख़्वाब के मलबे में दबा देखता हूँ
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