हज़ार वसवसे दिल में और इक दहकता अलाव
हयात-ए-दश्त में रातें गुज़ारने का अमल
बस एक ख़ोशा-ए-गंदुम और ऐसी दर-ब-दरी
वो आसमाँ को ज़मीं पर उतारने का अमल
ये उमर मेज़ है गवय्या क़िमार-ख़ाने की
बस एक जीत की ख़्वाहिश में हारने का अमल
वो बंद ख़ुशबू का बाद-ए-सबा के वो नाख़ुन
कली के जिस्म से कपड़े उतारने का अमल
ग़ज़ब का शोर मचाते होए ये सन्नाटे
वो बे-सदा भी किसी को पुकारने का अमल
हुई है शाम फिर अश्कों से इक वज़ू हो 'नदीम'
फिर एक रात सितारे शुमारने का अमल
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रात की ज़ुल्फ़ कहीं ता-ब-कमर खुल जाए
हम पे भी चाँद सितारों की डगर खुल जाए
हम पे भी चाँद सितारों की डगर खुल जाए
थक गई नींद मिरे ख़्वाब को ढोते ढोते
क्या तअज्जुब है मिरी आँख अगर खुल जाए
मेरा सरमाया मिरे पावँ के छालों की तपक
रास्ते में ही न सब ज़ाद-ए-सफ़र खुल जाए
आज दरिया नहीं कूज़े में समाने वाला
वक़्त है मुझ पे मिरा ज़ोम-ए-हुनर खुल जाए
सब मुसाफ़िर हैं नई राह की सब को है तलाश
सब पे मुमकिन तो नहीं राह-ए-दिगर खुल जाए
अपनी तन्हाई में महबूस हूँ मुद्दत से 'नदीम'
तू अगर साथ हो दीवार में दर खुल जाए
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मूँद लूँ आँख तो बे-कार है सब रंग-ए-जहाँ
क्या मिरी चश्म-ए-इनायत के सिवा भी कुछ है
कुछ तो है जिस के बताने से हूँ क़ासिर लेकिन
अब तिरे दर्द में लज़्ज़त के सिवा भी कुछ है
मेरी आँखों से कोई उस का सरापा देखे
तब खुलेगा कि क़यामत के सिवा भी कुछ है
हर तअल्लुक़ किसी क़ीमत का तलब-गार नहीं
दिल के सौदे में तिजारत के सिवा भी कुछ है
हाँ वो इक लम्हा कि हक़-गोई पे गर्दन कट जाए
या'नी ता-उम्र इबादत के सिवा भी कुछ है
हुस्न सब हुस्न-ए-तबीअ'त पे है मौक़ूफ़ 'नदीम'
या कहीं हुस्न-ए-तबीअ'त के सिवा भी कुछ है
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ख़िज़ाँ का राज़ जो आँखों पे मुन्कशिफ़ हो जाए
तो ज़र्द रुत भी बहारों का काम करती है
कहाँ का ज़र्फ़ कहाँ का वक़ार ये दुनिया
निगाह जेब पे रख कर सलाम करती है
ज़रूरतें दर-ए-शाही पे ले के जाती हैं
मिरी अना मुझे अपना ग़ुलाम करती है
हिसार-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ से निकाल दे या-रब
ये ज़िंदगी मिरा जीना हराम करती है
बुलंद-ओ-पस्त से परवाज़ मावरा है मिरी
ये काएनात मुझे ज़ेर-ए-दाम करती है
ख़ुदा का शुक्र कि मैं ख़ुद से आश्ना हूँ 'नदीम'
मिरी निगाह मिरा एहतिराम करती है
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जनम जनम की तकान होती न बाल-ओ-पर में
जो चंद लम्हे गुज़ार लेता तरी नज़र में
जो चंद लम्हे गुज़ार लेता तरी नज़र में
चले हो घर से तो काम आएँगे साथ ले लो
वफ़ा की ख़ुशबू वफ़ा का साया कड़े सफ़र में
रिवायतों से गुरेज़ कैसा चलो जगाएँ
नसीब सोया हुआ है अपना इसी खंडर में
ग़ज़ब का सूद-ओ-ज़ियाँ है अपने मिज़ाज में अब
बला की ठंडक उतर चक्की है रग-ए-शरर में
कभी तो सारा जहान हम को लगा है अपना
कभी नज़र आए अजनबी से ख़ुद अपने घर में
गल और तितली पे तब्सिरा क्या 'नदीम' करते
बुझे होए दिल जले मकानात थे नज़र में
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मैं था जो हद्द-ए-जिस्म से आगे न बढ़ सका
वो ले गया बदन से मिरे छीन कर मुझे
मैं ज़ाएअ'' हो चुका हूँ बहुत खेल खेल में
ऐ वक़्त अब न और लगा दाव पर मुझे
मेरे लिए क़ज़ा है अभी दाइमी हयात
कुछ लोग चाहते हैं अभी टूट कर मुझे
होना है मो'तबर मुझे अपनी निगाह में
कब ए'तिबार बख़्शेगी तेरी नज़र मुझे
मेरी तरह 'नदीम' उसे हिचकियाँ न आएँ
जो सोचता है रात कै पिछले पहर मुझे
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इक तीरगी देती है बसारत के क़रीने
इक रौशनी वो जिस में सुझाई नहीं देता
इक क़ैद है आज़ादी-ए-अफ़्कार भी गोया
इक दाम जो उड़ने से रिहाई नहीं देता
इक आह-ए-ख़ता गिर्या-ब-लब सुब्ह-ए-अज़ल से
इक दर है जो तौबा को रसाई नहीं देता
इक शौक़ बड़ाई का अगर हद से गुज़र जाए
फिर ''मैं'' के सिवा कुछ भी दिखाई नहीं देता
मत पूछिए चालाकियाँ मेरी कि मिरा ऐब
अब अहल-ए-नज़र को भी दिखाई नहीं देता
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रोज़ इस रूह की वीरानियाँ खिल उठती हैं
रोज़ इस दश्त में इक आबला-पा देखता हूँ
गुल खिलाते हैं नया रोज़ ये रिश्ते-नाते
रोज़ ही ख़ून का इक रंग नया देखता हूँ
एक सच ये है जो दुनिया को बरतने पे खुला
एक सच वो जो किताबों में लिखा देखता हूँ
आप हैं सब से जो अज़-राह-ए-ज़रूरत ही मिले
और मैं आप में भी ख़ू-ए-वफ़ा देखता हूँ
आँख भर कर मैं जिसे देख न पाया था 'नदीम'
ख़ुद को उस ख़्वाब के मलबे में दबा देखता हूँ
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गँवा चुका हूँ मैं चालीस साल जिस के लिए
वो एक पल मिरी पहचान होने वाला है
इसी लिए तो जलाता हूँ आँधियों में चराग़
यक़ीन है कि निगहबान होने वाला है
अब अपने ज़ख़्म नज़र आ रहे हैं फूल मुझे
शुऊर-ए-दर्द पशेमान होने वाला है
मिरे लिए तिरी जानिब से प्यार का इज़हार
मिरे ग़ुरूर का सामान होने वाला है
ये चोट है मिरी मुश्किल-पसंद फ़ितरत पर
जो मरहला था अब आसान होने वाला है
अगर ग़ुरूर है सूरज को अपनी हिद्दत पर
तो फिर ये क़तरा भी तूफ़ान होने वाला है
बहुत उरूज पे ख़ुश-फ़हमियाँ हैं अब उस की
वो अन-क़रीब पशेमान होने वाला है
तू अपना हाथ मिरे हाथ में अगर दे दे
तो ये फ़क़ीर भी सुलतान होने वाला है
चराग़-ए-दार की लौ माँद पड़ रही है 'नदीम'
फिर अपने नाम का एलान होने वाला है
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कहाँ कोई ख़ज़ाना चाहता हूँ
ज़रा सा मुस्कुराना चाहता हूँ
ज़रा सा मुस्कुराना चाहता हूँ
मुझे मौजें उछाले जा रही हैं
मैं कब से डूब जाना चाहता हूँ
जो पुरखों का सुनहरा कल यही है
तो वापस लौट जाना चाहता हूँ
कोई दिल हो किराए का मकाँ है
मैं अब ज़ाती ठिकाना चाहता हूँ
ख़ुदा मेरी अना महफ़ूज़ रक्खे
मैं दो रोटी कमाना चाहता हूँ
जो तू आए बिसात-ए-ज़िंदगी पर
तो ख़ुद को हार जाना चाहता हूँ
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