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आसमाँ के नीले नीले हाशिए
चाँद की रानाइयों के नौहागर
तीरगी लिपटी हुई दीवार से
सुब्ह की ताबानियों की मुंतज़िर
रास्तों के पेच ओ ख़म बाज़ार से
लौट कर आए हों जैसे बार बार
एक वीरानी है मेरी ग़म-गुसार
कुछ सियह कुछ सुर्ख़ कुछ ख़ाकिस्तरी
रंग के कुत्तों पे उजली धारियाँ
जिन की शिरयानों में शोरीदा-सरी
और दरयूज़ा-गरी का इम्तिज़ाज
ये समाँ और रात की जादूगरी
चाँद का ले कर चली हाथों में ताज
Read Fullचाँद की रानाइयों के नौहागर
तीरगी लिपटी हुई दीवार से
सुब्ह की ताबानियों की मुंतज़िर
रास्तों के पेच ओ ख़म बाज़ार से
लौट कर आए हों जैसे बार बार
एक वीरानी है मेरी ग़म-गुसार
कुछ सियह कुछ सुर्ख़ कुछ ख़ाकिस्तरी
रंग के कुत्तों पे उजली धारियाँ
जिन की शिरयानों में शोरीदा-सरी
और दरयूज़ा-गरी का इम्तिज़ाज
ये समाँ और रात की जादूगरी
चाँद का ले कर चली हाथों में ताज
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काकुलों के सुंबुलिस्ताँ आरिज़ों पर अक्स-रेज़
जैसे साहिल का नज़ारा आब-ए-दरिया पर चले
इक तअस्सुर है कि रक़्साँ हो रहा है हर तरफ़
शमएँ रौशन हैं चराग़ाँ हो रहा है हर तरफ़
आग के अतराफ़ रौशन जैसे इक फ़ानूस-ए-रक़्स
रक़्स करती लड़कियाँ कुछ आग के अतराफ़ यूँ
जैसे सतह-ए-आब पर महताब के हाले का अक्स
जिस को झूले में झुलाएँ मौज-हा-ए-सीमगूँ
मिल के जब झुकती हैं लगती हैं कली मुँह-बंद सी
और जब तनती हैं किस दर्जा भली दिल-बन्द सी
इक तरफ़ वो सुर्ख़ मिशअल हाथ में ले कर चले
कुछ हसीं कुछ नाज़नीं कुछ सर्व-क़द कुछ सीम-तन
जैसे कुछ फूलों के नाज़ुक नर्म-रौ लश्कर चले
नर्म-रफ़्तारी में दजला के तमव्वुज की फबन
जैसे सहराओं के आहू महव-ए-गुल-गश्त-ए-चमन
ये हसीं आहू-क़दम आहू-नफ़स आहू-मिज़ाज
ले रहे हैं नौ-जवानान-ए-क़बीला से ख़िराज
जल्वा-पैरा जल्वा-सामाँ कितने दिलकश माहताब
कितने अफ़्सानों के पैकर कितने रंग-ओ-बू के ख़्वाब
वो जबीनों के अरक़ में जैसे शोलों के सराब
जैसे संदल में शरारों के तबस्सुम महव-ए-ख़्वाब
शोला-अफ़्शाँ काकुलों में सुर्ख़ फूलों के चराग़
जैसे तारीकी में मिल जाएँ उजाले के सुराग़
आरिज़ों की चाँदनी फैली हुई सी हर तरफ़
हर तरफ़ है एक तरकश एक आहू हर क़दम
कर रहे हैं रक़्स दफ़ पर महविशान-ए-जल्वा-ताब
हर तरफ़ बिखरे हुए हैं वादी-ए-दजला के ख़्वाब
कुछ कँवल कुछ नस्तरन कुछ सुंबुलिस्ताँ कुछ गुलाब
Read Fullजैसे साहिल का नज़ारा आब-ए-दरिया पर चले
इक तअस्सुर है कि रक़्साँ हो रहा है हर तरफ़
शमएँ रौशन हैं चराग़ाँ हो रहा है हर तरफ़
आग के अतराफ़ रौशन जैसे इक फ़ानूस-ए-रक़्स
रक़्स करती लड़कियाँ कुछ आग के अतराफ़ यूँ
जैसे सतह-ए-आब पर महताब के हाले का अक्स
जिस को झूले में झुलाएँ मौज-हा-ए-सीमगूँ
मिल के जब झुकती हैं लगती हैं कली मुँह-बंद सी
और जब तनती हैं किस दर्जा भली दिल-बन्द सी
इक तरफ़ वो सुर्ख़ मिशअल हाथ में ले कर चले
कुछ हसीं कुछ नाज़नीं कुछ सर्व-क़द कुछ सीम-तन
जैसे कुछ फूलों के नाज़ुक नर्म-रौ लश्कर चले
नर्म-रफ़्तारी में दजला के तमव्वुज की फबन
जैसे सहराओं के आहू महव-ए-गुल-गश्त-ए-चमन
ये हसीं आहू-क़दम आहू-नफ़स आहू-मिज़ाज
ले रहे हैं नौ-जवानान-ए-क़बीला से ख़िराज
जल्वा-पैरा जल्वा-सामाँ कितने दिलकश माहताब
कितने अफ़्सानों के पैकर कितने रंग-ओ-बू के ख़्वाब
वो जबीनों के अरक़ में जैसे शोलों के सराब
जैसे संदल में शरारों के तबस्सुम महव-ए-ख़्वाब
शोला-अफ़्शाँ काकुलों में सुर्ख़ फूलों के चराग़
जैसे तारीकी में मिल जाएँ उजाले के सुराग़
आरिज़ों की चाँदनी फैली हुई सी हर तरफ़
हर तरफ़ है एक तरकश एक आहू हर क़दम
कर रहे हैं रक़्स दफ़ पर महविशान-ए-जल्वा-ताब
हर तरफ़ बिखरे हुए हैं वादी-ए-दजला के ख़्वाब
कुछ कँवल कुछ नस्तरन कुछ सुंबुलिस्ताँ कुछ गुलाब
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शहर की गलियाँ घूम रही हैं मेरे क़दम के साथ
ऐसे सफ़र में इतनी थकन में कैसे कटेगी रात
ऐसे सफ़र में इतनी थकन में कैसे कटेगी रात
ख़्वाब में जैसे घर से निकल के घूम रहा हो कोई
रात में अक्सर यूँ भी फिरी है तेरे लिए इक ज़ात
चंद बगूले ख़ुश्क ज़मीं पर और हवाएँ तेज़
इस सहरा में कैसी बहारें कैसी भरी बरसात
धूम मचाएँ बस्ती बस्ती सोच रहे थे आप
देखा किन किन वीरानों में ले के गए हालात
दिन में क़यामत ग़म-ख़्वारों की रात में याद-ए-यार
चंद नफ़स की मोहलत में भी इतने कठिन दिन रात
Read Fullरात में अक्सर यूँ भी फिरी है तेरे लिए इक ज़ात
चंद बगूले ख़ुश्क ज़मीं पर और हवाएँ तेज़
इस सहरा में कैसी बहारें कैसी भरी बरसात
धूम मचाएँ बस्ती बस्ती सोच रहे थे आप
देखा किन किन वीरानों में ले के गए हालात
दिन में क़यामत ग़म-ख़्वारों की रात में याद-ए-यार
चंद नफ़स की मोहलत में भी इतने कठिन दिन रात
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आदम की पहली आवाज़
इन पत्थरों में अब भी
इन पत्थरों में अब भी
चमक रही है जिन्हें पहली
बार मैं ने अपनी अपनी ज़मीं
मैं देखा मेरी सर-ज़मीं
उन बर्फ़ाब जिस्मों से आबाद है
जिन जिस्मों में ख़ूब-सूरत
आँखें नई जन्नत की सफ़ीर हैं फ़ीडयास
मैं तुझे
एक नए इंसान का चेहरा
दिखाता हूँ उस चेहरे पर
इंसानियत का ग्रीस है और
अज़्मत-ए-आदम की वो तस्वीर है
जो हमेशा मेरी ज़मीन पर चमकती
रहेगी मैं आदम को
फ़ितरत से अज़ीम समझता हूँ
मेरी रातों में पत्थर चमकते
मैं और मेरे दिन
मरमर की रातों से ज़ियादा रौशन हैं
ये देख ये आदम है जिस पर रौशनी
दाहिने कंधे से नीचे गिर रही है
रौशन-दान का दरवाज़ा बंद न करो
अभी आदम को अपनी ही ज़मीन के लिए इस
रौशनी की ज़रूरत है और मेरी ज़मीन
पर अब भी वो साया मौजूद है जिस
साए में अन-गिनत रातें अन-गिनत
रंग और अन-गिनत चेहरे मौजूद हैं
इन अँधेरे में रफ़ाईल ही नहीं
रोडन और हेनरीमोर भी घूम रहे हैं
अपने अपने मुजस्समों के साथ मगर में
अब एक नए आदम का मुजस्समा बनाऊँगा
जिस आदम के चेहरे पर अपनी ज़मीं की मिट्टी के
साथ अपनी ज़मीन का सूरज भी चमकेगा
काश मैं इस नए सूरज का
मुजस्समा बना सकूँ
Read Fullबार मैं ने अपनी अपनी ज़मीं
मैं देखा मेरी सर-ज़मीं
उन बर्फ़ाब जिस्मों से आबाद है
जिन जिस्मों में ख़ूब-सूरत
आँखें नई जन्नत की सफ़ीर हैं फ़ीडयास
मैं तुझे
एक नए इंसान का चेहरा
दिखाता हूँ उस चेहरे पर
इंसानियत का ग्रीस है और
अज़्मत-ए-आदम की वो तस्वीर है
जो हमेशा मेरी ज़मीन पर चमकती
रहेगी मैं आदम को
फ़ितरत से अज़ीम समझता हूँ
मेरी रातों में पत्थर चमकते
मैं और मेरे दिन
मरमर की रातों से ज़ियादा रौशन हैं
ये देख ये आदम है जिस पर रौशनी
दाहिने कंधे से नीचे गिर रही है
रौशन-दान का दरवाज़ा बंद न करो
अभी आदम को अपनी ही ज़मीन के लिए इस
रौशनी की ज़रूरत है और मेरी ज़मीन
पर अब भी वो साया मौजूद है जिस
साए में अन-गिनत रातें अन-गिनत
रंग और अन-गिनत चेहरे मौजूद हैं
इन अँधेरे में रफ़ाईल ही नहीं
रोडन और हेनरीमोर भी घूम रहे हैं
अपने अपने मुजस्समों के साथ मगर में
अब एक नए आदम का मुजस्समा बनाऊँगा
जिस आदम के चेहरे पर अपनी ज़मीं की मिट्टी के
साथ अपनी ज़मीन का सूरज भी चमकेगा
काश मैं इस नए सूरज का
मुजस्समा बना सकूँ
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तुम मुझे क़त्ल न करो
मैं ख़ुद कई टुकड़ों में बट जाऊँगा
मैं ख़ुद कई टुकड़ों में बट जाऊँगा
मेरा एक टुकड़ा
कपास का फूल बन जाएगा
और दूसरा वो आग
जो कपास के फूल से रौशन होती है
तुम मुझे क़त्ल न करो
मैं ख़ुद कई टुकड़ों में
बट जाऊँगा
मेरा एक टुकड़ा
दरिया बन जाएगा और दूसरा
वो चाँद जो इस दरिया में डूब जाता है
हाँ मुझे क़त्ल न करो
क्यूँकि मैं अपनी शहादत की
गवाही देने के लिए दोबारा
पैदा हो जाऊँगा
क्या तुम नहीं देखते कि सूरज
दोबारा निकल आता है
चाँद दोबारा तुलूअ' हो जाता है
और कपास का फूल दोबारा खिल जाता है
और इबादत-गाहों में आग
दोबारा रौशन हो जाती है
Read Fullकपास का फूल बन जाएगा
और दूसरा वो आग
जो कपास के फूल से रौशन होती है
तुम मुझे क़त्ल न करो
मैं ख़ुद कई टुकड़ों में
बट जाऊँगा
मेरा एक टुकड़ा
दरिया बन जाएगा और दूसरा
वो चाँद जो इस दरिया में डूब जाता है
हाँ मुझे क़त्ल न करो
क्यूँकि मैं अपनी शहादत की
गवाही देने के लिए दोबारा
पैदा हो जाऊँगा
क्या तुम नहीं देखते कि सूरज
दोबारा निकल आता है
चाँद दोबारा तुलूअ' हो जाता है
और कपास का फूल दोबारा खिल जाता है
और इबादत-गाहों में आग
दोबारा रौशन हो जाती है
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मेरी मोहब्बत चाहती है मीनारे घर के शिवालों के
कुछ बातें मक्के वालों की कुछ क़िस्से बनारस वालों के
कुछ बातें मक्के वालों की कुछ क़िस्से बनारस वालों के
मेरी तमन्ना सूरज बन के चमकती है गुलज़ारों पर
मेरी मोहब्बत साया बन के ठहरती है दिल-दारों पर
रौशनी मेरी बुलंदी बन के चमकी चाँद सितारों में
मैं ने गुलाब की आँखें देखीं अपने घर की बहारों में
मेरे लिए त्यौहार की रातें अब भी दिए जलाती हैं
मेरे लिए हर देस की यादें अब भी नाचने आती हैं
Read Fullमेरी मोहब्बत साया बन के ठहरती है दिल-दारों पर
रौशनी मेरी बुलंदी बन के चमकी चाँद सितारों में
मैं ने गुलाब की आँखें देखीं अपने घर की बहारों में
मेरे लिए त्यौहार की रातें अब भी दिए जलाती हैं
मेरे लिए हर देस की यादें अब भी नाचने आती हैं
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मेरी आँखें मेरी जान
तेरा इबादत-ख़ाना
तेरा इबादत-ख़ाना
और अपने लिए इक नार-ए-जहीम
मेरा दिल हिरनों के लिए
मैदान-ए-अज़ीम
और अपने लिए इक ख़ाना-ए-बीम
देख ज़रा हल्लाज का रक़्स
जिस ने अपनी मिट्टी
अपना ख़ून
न समझा अपना ख़ून
जिस के लिए लाया है कोई
एक विसाल-ए-दवाम
एक चराग़-ए-मुबीन
Read Fullमेरा दिल हिरनों के लिए
मैदान-ए-अज़ीम
और अपने लिए इक ख़ाना-ए-बीम
देख ज़रा हल्लाज का रक़्स
जिस ने अपनी मिट्टी
अपना ख़ून
न समझा अपना ख़ून
जिस के लिए लाया है कोई
एक विसाल-ए-दवाम
एक चराग़-ए-मुबीन
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वो बातें इश्क़ कहता था कि सारा घर महकता था
मिरा महबूब जैसे गुल था और बुलबुल चहकता था
मिरा महबूब जैसे गुल था और बुलबुल चहकता था
सफ़र में शाम हो जाती तो दिल में शमएँ जल उठतीं
लहू में फूल खिल जाते जहाँ ग़ुंचा चटकता था
कभी मैं सर्व की सूरत नज़र आता था यारों को
कभी ग़ुंचे की सूरत अपने ही दिल में धड़कता था
ख़ुदा जाने मैं उस के साथ रहता था कि आईना
मिरे पर्दे में अपने-आप को हैरत से तकता था
ख़ुदा जाने वो कैसा आदमी था जिस के माथे पर
कोई बिंदिया लगाता था तो इक जुगनू चमकता था
कभी रहता था उस के साथ मैं उस के गरेबाँ में
कभी फ़ुर्क़त में अपने आइने पर सर पटकता था
अँधेरी रात जब सावन में आती थी तो इक बुलबुल
ख़ुदा जाने कहाँ से आ के मेरे घर चहकता था
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