Qamar Jameel

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Qamar Jameel shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Qamar Jameel's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Ghazal

आसमाँ पर इक सितारा शाम से बेताब है मेरी आँखों में तुम्हारा ग़म नहीं है ख़्वाब है रात दरिया आईने में इस तरह आया कि मैं ये समझ कर सो गया दरिया नहीं इक ख़्वाब है कामनी सूरत में भी इक आरज़ू है महव-ए-ख़्वाब साँवली रंगत में भी इक वस्ल का कम-ख़्वाब है मेरी ख़ातिर कुछ सुनहरी साँवली मिट्टी भी थी वर्ना उस का जिस्म सारा रौशनी का ख़्वाब है आसमाँ इक बिस्तर-ए-संजाब लगता है मुझे और ये क़ौस-ए-क़ुज़ह जैसे कोई मेहराब है किस के इस्तिक़बाल को उट्ठे थे दीवानों के हाथ किस के मातम को यहाँ ये मज्मा'-ए-अहबाब है या इलाहाबाद में रहिए जहाँ संगम भी हो या बनारस में जहाँ हर घाट पर सैलाब है इस नहंग-ए-तिश्ना से ज़ोर-आज़मा हो कर 'जमील' भूल मत जाना कि आगे भी वही गिर्दाब है — Qamar Jameel
किस सफ़र में हैं कि अब तक रास्ते नादीदा हैं आसमाँ पे शमएँ रौशन हैं मगर ख़्वाबीदा हैं कितनी नम है आँसुओं से ये सनम-ख़ाने की ख़ाक ये तवाफ़-ए-गुल के लम्हे कितने आतिश-दीदा हैं ये गुलिस्ताँ है कि चलते हैं तमन्नाओं के ख़्वाब ये हवा है या बयाबाँ के क़दम लर्ज़ीदा हैं एक बस्ती इश्क़ की आबाद है दिल के क़रीब लेकिन इस बस्ती के रस्ते किस क़दर पेचीदा हैं आज भी हर फूल में बू-ए-वफ़ा आवारा है आज भी हर ज़ख़्म में तेरे करम पोशीदा हैं आज घर के आईने में सुब्ह से इक शख़्स है और खिड़की में सितारे शाम से पेचीदा हैं रहगुज़र कहती है जाग ऐ माहताब-ए-शाम-ए-यार हम सर-ए-बाज़ार चलते हैं मगर ख़्वाबीदा हैं आइने में किस की आँखें देखता हूँ मैं 'जमील' दो कँवल हैं बीच पानी में मगर नम-दीदा हैं — Qamar Jameel
वो बातें इश्क़ कहता था कि सारा घर महकता था मिरा महबूब जैसे गुल था और बुलबुल चहकता था सफ़र में शाम हो जाती तो दिल में शमएँ जल उठतीं लहू में फूल खिल जाते जहाँ ग़ुंचा चटकता था कभी मैं सर्व की सूरत नज़र आता था यारों को कभी ग़ुंचे की सूरत अपने ही दिल में धड़कता था ख़ुदा जाने मैं उस के साथ रहता था कि आईना मिरे पर्दे में अपने-आप को हैरत से तकता था ख़ुदा जाने वो कैसा आदमी था जिस के माथे पर कोई बिंदिया लगाता था तो इक जुगनू चमकता था कभी रहता था उस के साथ मैं उस के गरेबाँ में कभी फ़ुर्क़त में अपने आइने पर सर पटकता था अँधेरी रात जब सावन में आती थी तो इक बुलबुल ख़ुदा जाने कहाँ से आ के मेरे घर चहकता था — Qamar Jameel
शाम अजीब शाम थी जिस में कोई उफ़क़ न था फूल भी कैसे फूल थे जिन को सुख़न का हक़ न था यार अजीब यार था जिस के हज़ार नाम थे शहर अजीब शहर था जिस में कोई तबक़ न था हाथ में सब के जिल्द थी जिस के अजीब रंग थे जिस पे अजीब नाम थे और कोई वरक़ न था जैसे अदम से आए हों लोग अजीब तरह के जिन का लहू सफ़ेद था जिन का कलेजा शक़ न था जिन के अजीब तौर थे जिन में कोई किरन न थी जिन के अजीब दर्स थे जिन में कोई सबक़ न था लोग कटे हुए इधर लोग पड़े हुए उधर जिन को कोई अलम न था जिन को कोई क़लक़ न था जिन का जिगर सिया हुआ जिन का लहू बुझा हुआ जिन का रफ़ू किया हुआ चेहरा बहुत अदक़ न था कैसा तिलिस्मी शहर था जिस के तुफ़ैल रात भी मेरे लहू में गर्द थी आईना-ए-शफ़क़ न था — Qamar Jameel
दस्त-ए-जुनूँ में दामन-ए-गुल को लाने की तदबीर करें नर्म हवा के झोंको आओ मौसम को ज़ंजीर करें मौसम-ए-अब्र-ओ-बाद से पोछें लज़्ज़त-ए-सोज़ाँ का मफ़्हूम मौजा-ए-ख़ूँ से दामन-ए-गुल पर हर्फ़-ए-जुनूँ तहरीर करें आमद-ए-गुल का वीरानी भी देख रही है क्या क्या ख़्वाब वीरानी के ख़्वाब को आओ वहशत से ता'बीर करें रात के जागे सुब्ह की हल्की नर्म हवा में सोए हैं देखें कब तक नींद के माते उठने में ताख़ीर करें तन्हाई में काहिश-ए-जाँ के हाथों किस आराम से हैं कैसे अपने नाज़ उठाएँ क्या अपनी तहक़ीर करें बे-ताबी तो ख़ैर रहेगी बे-ताबी की बात नहीं मरना इतना सहल नहीं है जीने की तदबीर करें घूम रहे हैं दश्त-ए-जुनूँ में उन के क्या क्या रूप 'जमील' किस को देखें किस को छोड़ें किस को जा के असीर करें — Qamar Jameel

Nazm

आदम की पहली आवाज़ इन पत्थरों में अब भी चमक रही है जिन्हें पहली बार मैं ने अपनी अपनी ज़मीं मैं देखा मेरी सर-ज़मीं उन बर्फ़ाब जिस्मों से आबाद है जिन जिस्मों में ख़ूब-सूरत आँखें नई जन्नत की सफ़ीर हैं फ़ीडयास मैं तुझे एक नए इंसान का चेहरा दिखाता हूँ उस चेहरे पर इंसानियत का ग्रीस है और अज़्मत-ए-आदम की वो तस्वीर है जो हमेशा मेरी ज़मीन पर चमकती रहेगी मैं आदम को फ़ितरत से अज़ीम समझता हूँ मेरी रातों में पत्थर चमकते मैं और मेरे दिन मरमर की रातों से ज़ियादा रौशन हैं ये देख ये आदम है जिस पर रौशनी दाहिने कंधे से नीचे गिर रही है रौशन-दान का दरवाज़ा बंद न करो अभी आदम को अपनी ही ज़मीन के लिए इस रौशनी की ज़रूरत है और मेरी ज़मीन पर अब भी वो साया मौजूद है जिस साए में अन-गिनत रातें अन-गिनत रंग और अन-गिनत चेहरे मौजूद हैं इन अँधेरे में रफ़ाईल ही नहीं रोडन और हेनरीमोर भी घूम रहे हैं अपने अपने मुजस्समों के साथ मगर में अब एक नए आदम का मुजस्समा बनाऊँगा जिस आदम के चेहरे पर अपनी ज़मीं की मिट्टी के साथ अपनी ज़मीन का सूरज भी चमकेगा काश मैं इस नए सूरज का मुजस्समा बना सकूँ — Qamar Jameel
ये अदाएँ रक़्स के हंगाम कितनी रक़्स-ख़ेज़ वो जवानान-ए-क़बीला होश से बाहर चले काकुलों के सुंबुलिस्ताँ आरिज़ों पर अक्स-रेज़ जैसे साहिल का नज़ारा आब-ए-दरिया पर चले इक तअस्सुर है कि रक़्साँ हो रहा है हर तरफ़ शमएँ रौशन हैं चराग़ाँ हो रहा है हर तरफ़ आग के अतराफ़ रौशन जैसे इक फ़ानूस-ए-रक़्स रक़्स करती लड़कियाँ कुछ आग के अतराफ़ यूँँ जैसे सतह-ए-आब पर महताब के हाले का अक्स जिस को झूले में झुलाएँ मौज-हा-ए-सीमगूँ मिल के जब झुकती हैं लगती हैं कली मुँह-बंद सी और जब तनती हैं किस दर्जा भली दिल-बन्द सी इक तरफ़ वो सुर्ख़ मिशअल हाथ में ले कर चले कुछ हसीं कुछ नाज़नीं कुछ सर्व-क़द कुछ सीम-तन जैसे कुछ फूलों के नाज़ुक नर्म-रौ लश्कर चले नर्म-रफ़्तारी में दजला के तमव्वुज की फबन जैसे सहराओं के आहू महव-ए-गुल-गश्त-ए-चमन ये हसीं आहू-क़दम आहू-नफ़स आहू-मिज़ाज ले रहे हैं नौ-जवानान-ए-क़बीला से ख़िराज जल्वा-पैरा जल्वा-सामाँ कितने दिलकश माहताब कितने अफ़्सानों के पैकर कितने रंग-ओ-बू के ख़्वाब वो जबीनों के अरक़ में जैसे शोलों के सराब जैसे संदल में शरारों के तबस्सुम महव-ए-ख़्वाब शोला-अफ़्शाँ काकुलों में सुर्ख़ फूलों के चराग़ जैसे तारीकी में मिल जाएँ उजाले के सुराग़ आरिज़ों की चाँदनी फैली हुई सी हर तरफ़ हर तरफ़ है एक तरकश एक आहू हर क़दम कर रहे हैं रक़्स दफ़ पर महविशान-ए-जल्वा-ताब हर तरफ़ बिखरे हुए हैं वादी-ए-दजला के ख़्वाब कुछ कँवल कुछ नस्तरन कुछ सुंबुलिस्ताँ कुछ गुलाब — Qamar Jameel
अव्वल हल्क़ा-ए-याराँ में कनआँ रात के पिछले पहर बस्तियों से दूर नहरों के किनारे ख़ेमा-ज़न वो दरख़्तों की हवाओं में सितारे ख़ेमा-ज़न बस्तियों से दूर सहरा के नज़ारे ख़ेमा-ज़न हल्क़ा-ए-याराँ में कितने नाज़नीं नाज़ुक कमर दोम रक़्स के हंगाम कितने बाज़ुओं का पेच-ओ-ख़म देखने वालों की नज़रों में उतर आने को है ये बदन का लोच जैसे रूह बल खाने को है ये नज़र के सामने कितने ही आलम ख़्वाब से रक़्स के हंगाम उभर आते हैं कितने शोख़ रंग और कितने तेज़ हो जाते हैं नज़रों के ख़दंग ये ख़यालों के गुलिस्ताँ ये निगाहों के क़फ़स रक़्स के ये दाएरे शोला-ब-दामाँ हर नफ़स सोयम रस्म अदा होने न पाई थी कि ख़ेमों के क़रीब शह-नशीं की सम्त दौड़े इस तरह वहशी नक़ीब कितने अरमाँ कितने ग़म अश्कों में ढल कर रह गए ऐन जश्न-ए-रस्म के हंगाम कनआँ का गुरेज़ कितने मंज़र आरिज़-ओ-लब के पिघल कर रह गए कितने लब हसरत-चाशीदा कितनी आँखें अश्क-रेज़ जैसे साग़र आएँ हाथों में मगर टूटे हुए छेड़ियो मत ज़िंदगी के बाल-ओ-पर टूटे हुए तार हैं इस साज़ के ऐ नग़्मा-गर टूटे हुए चहारुम ये क़बीलों के शुयूख़-ए-पुख़्ता-उम्र ओ सख़्त-कोश वादी-ए-दजला के शहरी कुर्द के ख़ाना-ब-दोश लड़ रहे हैं अपनी अपनी कज-कुलाही के लिए कौन दारू बन के आए कम-निगाही के लिए गर्मी-ए-गुफ़्तार से मुमकिन नहीं दिल का रफ़ू गुफ़्तुगू से और बढ़ जाता है जोश-ए-गुफ़्तुगू — Qamar Jameel