Saleem Ahmad

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@saleem-ahmad

Saleem Ahmad shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Saleem Ahmad's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

न जाने शे'र में किस दर्द का हवाला था कि जो भी लफ़्ज़ था वो दिल दुखाने वाला था — Saleem Ahmad
मंज़िल का पता है न किसी राह-गुज़र का बस एक थकन है कि जो हासिल है सफ़र का — Saleem Ahmad
घास में जज़्ब हुए होंगे ज़मीं के आँसू पाँव रखता हूँ तो हल्की सी नमी लगती है — Saleem Ahmad
दर-ब-दर ठोकरें खाईं तो ये मालूम हुआ घर किसे कहते हैं क्या चीज़ है बे-घर होना — Saleem Ahmad

Ghazal

दिल के अंदर दर्द आँखों में नमी बन जाइए इस तरह मिलिए कि जुज़्व-ए-ज़िंदगी बन जाइए इक पतिंगे ने ये अपने रक़्स-ए-आख़िर में कहा रौशनी के साथ रहिए रौशनी बन जाइए जिस तरह दरिया बुझा सकते नहीं सहरा की प्यास अपने अंदर एक ऐसी तिश्नगी बन जाइए देवता बनने की हसरत में मुअल्लक़ हो गए अब ज़रा नीचे उतरिए आदमी बन जाइए अक़्ल-ए-कुल बन कर तो दुनिया की हक़ीक़त देख ली दिल ये कहता है कि अब दीवानगी बन जाइए जिस तरह ख़ाली अँगूठी को नगीना चाहिए आलम-ए-इम्काँ में इक ऐसी कमी बन जाइए आलम-ए-कसरत निहाँ है इस इकाई में 'सलीम' ख़ुद में ख़ुद को जम्अ'' कीजे और कई बन जाइए — Saleem Ahmad
ज़िंदगी मौत के पहलू में भली लगती है घास इस क़ब्र पे कुछ और हरी लगती है रोज़ काग़ज़ पे बनाता हूँ मैं क़दमों के नुक़ूश कोई चलता नहीं और हम-सफ़री लगती है आँख मानूस-ए-तमाशा नहीं होने पाती कैसी सूरत है कि हर रोज़ नई लगती है घास में जज़्ब हुए होंगे ज़मीं के आँसू पाँव रखता हूँ तो हल्की सी नमी लगती है सच तो कह दूँ मगर इस दौर के इंसानों को बात जो दिल से निकलती है बुरी लगती है मेरे शीशे में उतर आई है जो शाम-ए-फ़िराक़ वो किसी शहर-ए-निगाराँ की परी लगती है बूँद भर अश्क भी टपका न किसी के ग़म में आज हर आँख कोई अब्र-ए-तही लगती है शोर-ए-तिफ़्लाँ भी नहीं है न रक़ीबों का हुजूम लौट आओ ये कोई और गली लगती है घर में कुछ कम है ये एहसास भी होता है 'सलीम' ये भी खुलता नहीं किस शय की कमी लगती है — Saleem Ahmad