गिनती के चार दिन हयात के हैं
बाक़ी जितने बचे वफ़ात के हैं
आप की माने भी तो हम क्यूँकर
आप साहिब कब अपनी बात के हैं
नाम मेरा लिखा हुआ है पर
रंग मेहँदी में और हाथ के हैं
ये जो बिस्तर पे लाश हो रखे हैं
ये सभी गुल सुहागरात के हैं
वो भले हैं तो होंगे मुझ को क्या
ये बुरे हैं प मेरी ज़ात के हैं
— Prit















