ज़ेहन में वो कभी ज़्यादा कभी थोड़ा उतरता था
पर उसका कुछ न कहना थोड़ा सा ज़्यादा उतरता था
मसाइल थी गली उसकी गुज़रना था बड़ा मुशकिल
बड़ी मुश्किल में पैरों से मेरे रस्ता उतरता था
नज़र में वो रखा करता नज़रअंदाज़ करके भी
वो जितनी सीढ़ी चढ़ता था वो बस उतना उतरता था
मुझे है याद बचपन में वो सी सा वाले झूले में
वो रोती, इसलिए मैं बाद में हँसता उतरता था
मैं झपकी लेता बस इस ज़द में, उठ के सब भुला दूँगा
वो ज़ेवर ज़िस्म से मेरे उतारे ना उतरता था
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