Meaning of

ख़ामख़ा

khaamkhaa • خامخا

व्यर्थ; बिना कारण

in vain; without reason

بے فائدہ; بلا وجہ

Persian

सभी तारीफ हैं बस ख़ामखा़ की हमारा दिल कहाँ देखा किसी ने — Gopesh "Tanha"
ख़ामख़ाँ बेवजह और क्या बोलना बोलते बोलते ही गुज़ारी ये उम्र — Aashish kargeti 'Kash'
ख़ामख़ा ही तुझे मैं छुपाता रहा दौर ये चल रहा है सर-ए-आम का — Madan Gopal 'AloukiK'
ख़ामख़ा फूल बिछा रक्खे हो तुम उस के लिए लौट कर कोई नहीं आता है जाने के बा'द — Raj Tiwari
वो समझते भी नहीं हाल-ए-दिल खा-म-खाँ शाद हुए जाते हैं — Akash Rajpoot
तेरे बिन भी ज़िंदा हैं हम तो अब तक शायद फिर वो तेरे बिन मर जाएँगे लोग ख़ामख़ा कहते होंगे — Pankaj murenvi
हड्डियाँ ख़ामख़ा ही अकड़ करती हैं उस के छू लेने से चूर हो जाता हूँ — Madan Gopal 'AloukiK'

'ख़ामख़ा' शब्द उन क्रियाओं या भावनाओं का सुझाव देता है जिनका कोई उद्देश्य या औचित्य नहीं होता। यह व्यर्थता का सार और उन प्रयासों में संलग्न होने की मानव प्रवृत्ति को पकड़ता है जो निरर्थक लग सकते हैं।

कवि 'ख़ामख़ा' का उपयोग कुछ मानव क्रियाओं या भावनाओं की बेतुकापन व्यक्त करने के लिए करते हैं। यह अक्सर प्रयास और परिणाम के बीच के विरोधाभास को उजागर करता है, जीवन के प्रयासों की विडंबना को रेखांकित करता है।

'ख़ामख़ा' में, कवि जीवन के विरोधाभासों और व्यर्थता में छिपे हास्य का प्रतिबिंब पाते हैं।