Meaning of

ख़ामखा़

khaamkhaa • خامخا

बेवजह; बिना कारण; व्यर्थ

needlessly; without reason; in vain

خامخا; بلا وجہ; بے سود

Persian

ख़ामख़ा ही तुझे मैं छुपाता रहा
दौर ये चल रहा है सर-ए-आम का

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सभी तारीफ हैं बस ख़ामखा़ की
हमारा दिल कहाँ देखा किसी ने

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ख़ामख़ा फूल बिछा रक्खे हो तुम उस के लिए
लौट कर कोई नहीं आता है जाने के बा'द

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क्या होगा फिक्र ये करें क्यूँ हम ही ख़ामख़ाह
इस हिज्र में जलाएँ न अब हम जी ख़ामख़ाह

तुम सेे बिछड़ के दिल मिरा रोया है उम्र भर
ऐसा लगा कि ज़िंदगी हमनें जी ख़ामख़ाह

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वो समझते भी नहीं हाल-ए-दिल
खा-म-खाँ शाद हुए जाते हैं

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ज़िंदगी की रज़ा बढ़ाते थे
ख़ामख़ा ही सज़ा बढ़ाते थे

लाश छू कर निकल गई साँसें
मौत का भी मज़ा बढ़ाते थे

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तेरे बिन भी ज़िंदा हैं हम तो अब तक शायद फिर वो
तेरे बिन मर जाएँगे लोग ख़ामख़ा कहते होंगे

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ख़ामख़ाँ बेवजह और क्या बोलना
बोलते बोलते ही गुज़ारी ये उम्र

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हड्डियाँ ख़ामख़ा ही अकड़ करती हैं
उस के छू लेने से चूर हो जाता हूँ

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ख़ामख़ा ही तुझे मैं छुपाता रहा
दौर ये चल रहा है सर-ए-आम का

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सभी तारीफ हैं बस ख़ामखा़ की
हमारा दिल कहाँ देखा किसी ने

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'ख़ामखा़' उन क्रियाओं या भावनाओं का सार प्रस्तुत करता है जो उद्देश्य या औचित्य से रहित होती हैं। कविता में, यह अक्सर कुछ प्रयासों की निरर्थकता, एकतरफा प्रेम की विडंबना, या जीवन के अप्रत्याशित मोड़ों के हास्य को उजागर करता है।

कवि 'ख़ामखा़' का उपयोग जीवन के निरर्थक प्रयासों की विडंबना और उदासी को व्यक्त करने के लिए करते हैं। यह प्रतीक्षा की खालीपन, अधूरे वादों का दुख, या भाग्य की मनमौजी प्रकृति को दर्शा सकता है।

'ख़ामखा़' जीवन की बेतुकी बातों की मार्मिक सुंदरता को दर्शाता है। यह हमें याद दिलाता है कि सभी रास्तों को मंजिल की आवश्यकता नहीं होती।