Meaning of

दोजख़

dozakh • دوزخ

नरक; दोज़ख़

hell; inferno

دوزخ; جہنم

Persian

किसे जन्नत मिलेगी या किसे दोज़ख़ मिलेगा
इसे भी तय ज़मीं पर रहने वाले कर रहे हैं

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मसाइल तो बहुत से हैं मगर बस एक ही हल है
सहरस शाम तक सर मेरा है बेगम की चप्पल है

मेरे मालिक भला इस सेे बुरी भी क्या सज़ा होगी
मेरा शादीशुदा होना ही दोज़ख़ की रिहर्सल है

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उन से दोज़ख़ में पूछ बैठा हूँ
शैख़ जी आप और यहाँ कैसे

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बच्चों को मालूम है दुनिया दोज़ख है
पैदा होते ही सब रोने लगते हैं

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जाने वाले कह पाते तो कहते आने वालों से
दुनिया दोज़ख़ जैसी ही है बस में हो तो मत आना

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हो गई यार ये तो दोज़ख़ सी
ज़िंदगी काश ज़िंदगी रहती

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तब जा के कहीं ज़ाबित-ओ-मज़बूत हुए हैं
हम साल कई आतिश-ए-दोज़ख़ में जले हैं

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बस वही लोग जन्नती होंगे
और सारे ही दोज़ख़ी होंगे

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मैं तो बस इक सफ़र का ही परिंदा हूँ
सफ़र के ख़त्म होने तक ही ज़िंदा हूँ

मुझे तुम ख़्वाब जन्नत के दिखाओ मत
मैं दोज़ख़ से निकाला इक दरिंदा हूँ

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मैं समझ बैठा था जन्नत अपने बच्चों की उसे
कर गई वो यार दोज़ख़ मेरी पूरी ज़िंदगी

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किसे जन्नत मिलेगी या किसे दोज़ख़ मिलेगा
इसे भी तय ज़मीं पर रहने वाले कर रहे हैं

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मसाइल तो बहुत से हैं मगर बस एक ही हल है
सहरस शाम तक सर मेरा है बेगम की चप्पल है

मेरे मालिक भला इस सेे बुरी भी क्या सज़ा होगी
मेरा शादीशुदा होना ही दोज़ख़ की रिहर्सल है

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'दोजख़' शब्द एक अग्निमय गर्त की छवि प्रस्तुत करता है, एक ऐसा स्थान जो पीड़ा और कष्ट से भरा है। कविता में, यह अक्सर आत्मा के आंतरिक संघर्ष और पीड़ा का प्रतीक होता है, भावनात्मक और आध्यात्मिक संघर्ष का रूपक।

कवि 'दोजख़' का उपयोग पीड़ा और मुक्ति के विषयों की खोज के लिए करते हैं। यह निराशा से आशा की ओर आत्मा की यात्रा के लिए पृष्ठभूमि के रूप में कार्य करता है।

काव्यात्मक परिदृश्य में, 'दोजख़' आत्मा के सबसे अंधेरे परीक्षणों और प्रकाश की खोज का एक शक्तिशाली प्रतीक है।