Meaning of

फ़र्द

fard • فرد

व्यक्ति; इंसान; स्व

individual; person; self

فرد; انسان; خود

Arabic

ग़म-ए-फ़र्दा न मरने और जीने दे 'मनोहर' अब
दिलों दिल में उसी से क्यूँँ उदासी ख़ूब छा जाती

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देखा जो खा के तीर कमीं-गाह की तरफ़
अपने ही दोस्तों से मुलाक़ात हो गई

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यार मिरे कहते हैं कि तुम ने उस
में ऐसा क्या देखा
मैं ने उस की आँखों में यारों फ़र्दा अपना देखा

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मुनफ़रिद ख़ुशबू है इस शजर की
ऐसा लगता है उस ने छुआ हो

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ओ पागल पागल फिरदे होंगे
जो तेरे उत्थे मरदे होंगे

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सनम दिल में मिरे थोड़ा मगर ये दर्द बाक़ी है
चला आ बेड पर सोने यहाँ पे फ़र्द बाक़ी है

रहा है दर्द सर में हो, बहुत चश्मा लगाया है
लगाया है बहुत मरहम मगर सर दर्द बाक़ी है

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फ़र्द-ए-बशर हो तुम फ़क़त
क्यूँँ बोलते हो तुम सक़त

मग़रूर हो ख़ुद इल्म में
ये ऐब क्यूँँ लाए फ़क़त

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फ़र्दा हो कि पस-ए-फ़र्दा
मुझ को अब उम्मीद नहीं

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नाज़ हर वक़्त तेरे कौन उठाएगा बता
अब मेरे बा'द तुझे कौन मनाएगा बता

अपने क़दमों को तो मैं गिन के रखूँ राहों में
चल के तू साथ कहाँ तक मेरे आएगा बता

इक मुझे छोड़ के हर सम्त नज़र तेरी गई
और कितना तू निगाहों से गिराएगा बता

मुझ पे इल्ज़ाम लगाने से ये पहले सुन ले
क्या करेगा जो तेरा नाम भी आएगा बता

आतिश-ए-इश्क़ में हम शौक़ से जल जाएँगे
खाक़ मेरी तू हवाओं में उड़ाएगा बता

हम ज़माने से भी लड़ जाएँ जो तेरी ख़ातिर
फ़र्द तू फ़र्ज़ मुहब्बत का निभाएगा बता

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फिरदौस ओ खुल्द जन्नत ओ कूचा ए जाने जाँ
है लफ्ज़ चार, चारों का मतलब पर एक हैं

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ग़म-ए-फ़र्दा न मरने और जीने दे 'मनोहर' अब
दिलों दिल में उसी से क्यूँँ उदासी ख़ूब छा जाती

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देखा जो खा के तीर कमीं-गाह की तरफ़
अपने ही दोस्तों से मुलाक़ात हो गई

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'फ़र्द' का मूल अर्थ व्यक्ति या एकल इकाई है, जो किसी व्यक्ति की विशिष्टता और स्वायत्तता को दर्शाता है। कविता में, यह शब्द अक्सर एकांत, पहचान और आत्मा की आंतरिक दुनिया के विषयों को गहराई से व्यक्त करता है।

कवि 'फ़र्द' का उपयोग व्यक्तित्व की सार्थकता और भीतर की मौन संघर्षों को व्यक्त करने के लिए करते हैं। यह सामूहिक शब्दों के विपरीत, आत्मा की एकाकी यात्रा को उजागर करता है।

कविता के क्षेत्र में, 'फ़र्द' एक दर्पण बन जाता है जो हमारे द्वारा तय किए गए एकाकी मार्गों को प्रतिबिंबित करता है।