Meaning of

आरिज़

ariz • آرِز

गाल; चेहरा

cheek; face

رخسار; چہرہ

Arabic

ये आख़िर बार तुम्हें दिल से लिख रहे हैं ख़त
अरीज़ा फिर कभी दरिया में बहाएंगे नहीं

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बहरस ख़ारिज हूँ ये मालूम है
पर तुम्हारी ही ग़ज़ल का शे'र हूँ

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बोसे अपने आरिज़-ए-गुलफ़ाम के
ला मुझे दे दे तिरे किस काम के

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जो उन को लिपटा के गाल चूमा हया से आने लगा पसीना
हुई है बोसों की गर्म भट्टी खिंचे न क्यूँँकर शराब-ए-आरिज़

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क्या क़यामत है कि आरिज़ उन के नीले पड़ गए
हम ने तो बोसा लिया था ख़्वाब में तस्वीर का

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अगर इमारत बनी कभी ख़ारिज शे'रों की
सब सेे ज़्यादा ईंटें मेरे नाम की होंगी

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उस के आरिज़ पे हैं दोनो जहान माइल
उस ने हूरों को शैदाई बना रखा है

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वो मिले जहाँ भी थे चूमते थे ज्यूँँ झुमके
लब कभी न मिल पाए वो सफ़र था आरिज़ तक

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आरिज़ों को चूमने की ताक में रहता है हर दम
तेरा दिलवाया हुआ झुमका भी तेरे हू-ब-हू है

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ख़ूब-सूरत है चमन वो जिस चमन में तितलियाँ हैं
दोस्त जन्नत जैसा है घर जिस भी घर में बेटियाँ हैं

है उदासी बस इसी की एक भाई को कि 'आरिज़'
क्यूँँ लिखीं तक़दीर में बहनों से इतनी दूरियाँ हैं

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ये आख़िर बार तुम्हें दिल से लिख रहे हैं ख़त
अरीज़ा फिर कभी दरिया में बहाएंगे नहीं

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बहरस ख़ारिज हूँ ये मालूम है
पर तुम्हारी ही ग़ज़ल का शे'र हूँ

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‘आरिज़’ शब्द गाल को संदर्भित करता है, जो चेहरे का एक हिस्सा है और अक्सर सुंदरता और कोमलता का प्रतीक होता है। कविता में, यह प्रिय के चेहरे की कोमलता या भावनाओं की लाली को जागृत कर सकता है, कोमलता और अंतरंगता के क्षणों को पकड़ता है।

कवि अक्सर ‘आरिज़’ का उपयोग चेहरे की सुंदरता और अभिव्यक्ति का वर्णन करने के लिए करते हैं। यह प्रेम की लाली या दुःख की पीली छाया का प्रतीक हो सकता है। यह शब्द ‘ज़र्द’ (पीला) के विपरीत है, जो भावनाओं की गतिशील अभिव्यक्तियों को उजागर करता है।

कविता में, ‘आरिज़’ भावना और सुंदरता के नाजुक अंतःक्रिया को पकड़ता है, चेहरे की मौन वाक्पटुता का प्रमाण।