Meaning of

बय्यत

bayyat • بیت

शेर; दोहा

verse; couplet

شعر; دوہا

Arabic

गुज़रता ही नहीं वो एक लम्हा
इधर मैं हूँ कि बीता जा रहा हूँ

28

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आज इक और बरस बीत गया उस के बग़ैर
जिस के होते हुए होते थे ज़माने मेरे

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं
हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं

तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू
तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं

77

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बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँँ नहीं जाता
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँँ नहीं जाता

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हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
'उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में

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कुछ लोग ख़यालों से चले जाएँ तो सोएँ
बीते हुए दिन रात न याद आएँ तो सोएँ

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एक बरस और बीत गया
कब तक ख़ाक उड़ानी है

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आप पहलू में जो बैठें तो सँभल कर बैठें
दिल-ए-बेताब को आदत है मचल जाने की

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बे-ख़ुदी में ले लिया बोसा ख़ता कीजे मुआ'फ़
ये दिल-ए-बेताब की सारी ख़ता थी मैं न था

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मुझे तो उस का भीतरी ग़ुबार है निकालना
सो आँख चूमता हूँ उस के होंठ चूमता नहीं

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गुज़रता ही नहीं वो एक लम्हा
इधर मैं हूँ कि बीता जा रहा हूँ

28

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आज इक और बरस बीत गया उस के बग़ैर
जिस के होते हुए होते थे ज़माने मेरे

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'बय्यत' मूल रूप से कविता की एक इकाई को संदर्भित करता है, जो अक्सर एक संपूर्ण विचार या भावना को समेटे हुए होता है। कविता में, यह गहन अभिव्यक्ति का माध्यम बन जाता है, जहाँ प्रत्येक पंक्ति अकेले खड़ी हो सकती है, फिर भी एक बड़े संपूर्ण का हिस्सा होती है।

कवि अक्सर 'बय्यत' का उपयोग स्पष्टता के क्षण या गहन भावना को समेटने के लिए करते हैं। यह ग़ज़लों और अन्य काव्य रूपों में एक निर्माण खंड के रूप में कार्य करता है, जहाँ प्रत्येक शेर एक विशिष्ट विषय को व्यक्त कर सकता है।

कविता की दुनिया में, 'बय्यत' संक्षिप्तता और गहराई की शक्ति का प्रमाण है।