Meaning of

बेशक़

beshak • بیشک

निःसंदेह; बिना शक

undoubtedly; without a doubt

بیشک; بلا شبہ

Persian

मिरे अंदाज़ ज़माने से निराले होंगे
आज अँधेरे हैं तो क्या कल को उजाले होंगे

एक रोटी में सुनाते हैं तुझे कितना कुछ
कल से होंटों पे तिरे मेरे निवाले होंगे

कम से कम सैकड़ों को भूख ने मारा होगा
बच गए जितने सभी दर्द ने पाले होंगे

अब हमें मौत भी मक़बूल नहीं करती है
ज़िंदगी तू ही बता किस के हवाले होंगे

हर दफ़ा छीन लिया मेरा निवाला सबने
फिर तो बच्चे भी तिरे भूख ने पाले होंगे

अरे कमरे में मिरे कुछ भी नहीं है सच्ची
चार दीवार मिलेंगी बचे जाले होंगे

शहर-ए-दिल में सुनो तो कोई नहीं रहता है
तुम कहाँ जा रहे हो सब में ही ताले होंगे

छोड़ के ख़ुद को ज़माने को दिया है मरहम
फिर तो बेशक ही तिरे पाँव में छाले होंगे

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हमारी मौत पर बेशक ज़माना आएगा रोने
मगर ज़िंदा हैं जब तक चैन से जीने नहीं देगा

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आदमी तो आप बेशक हैं बड़े बलवान लेकिन
ज़िंदगी तो आप की भी औरतों के हाथ में है

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चाहे आब-ओ-ताब समझ लो या फिर कोई ख़्वाब समझ लो
आवारा फिरना है मुझ को चाहो तो महताब समझ लो

समझो मुझ को गहराई से पहचानो तो परछाईं से
एक अकेला ही काफ़ी हूँ बेशक तुम सैलाब समझ लो

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सच है रियाज़ी और सब कुछ भी पढ़ाया है मिरे उस्ताद ने
जी हाँ सही रस्ते पे चलना भी सिखाया है मिरे उस्ताद ने

दिल से लगा के प्यार से समझा के मेहनत ख़ूब कर के इस क़दर
बेशक बुरे से आदमी अच्छा बनाया है मिरे उस्ताद ने

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मेरी ग़ज़लों मिरे शे'रों में होंगी ग़लतियाँ बेशक
नहीं भेजा कोई मिसरा कभी उस्ताद को हम ने

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मैं 'नित्य' बरगद का बीज छोटा छिटक पड़ा हूँ ज़मीन पर तो
ये तय है इक दिन उगूँगा बेशक बिखर गया हूँ ये मत समझना

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लग गई मुझ को नज़र बेशक तुम्हारी आईनों
मैं बहुत ख़ुश था किसी इक सिलसिले से उन दिनों

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गुम गलियों में यादों की हम होकर कहीं
खोजा बहुत ख़ुद को मिले बेशक नहीं

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मोहब्बत वो मुझ सेे ही करती थी, बेशक
मगर, उस के यारों ने भटका दिया है

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मिरे अंदाज़ ज़माने से निराले होंगे
आज अँधेरे हैं तो क्या कल को उजाले होंगे

एक रोटी में सुनाते हैं तुझे कितना कुछ
कल से होंटों पे तिरे मेरे निवाले होंगे

कम से कम सैकड़ों को भूख ने मारा होगा
बच गए जितने सभी दर्द ने पाले होंगे

अब हमें मौत भी मक़बूल नहीं करती है
ज़िंदगी तू ही बता किस के हवाले होंगे

हर दफ़ा छीन लिया मेरा निवाला सबने
फिर तो बच्चे भी तिरे भूख ने पाले होंगे

अरे कमरे में मिरे कुछ भी नहीं है सच्ची
चार दीवार मिलेंगी बचे जाले होंगे

शहर-ए-दिल में सुनो तो कोई नहीं रहता है
तुम कहाँ जा रहे हो सब में ही ताले होंगे

छोड़ के ख़ुद को ज़माने को दिया है मरहम
फिर तो बेशक ही तिरे पाँव में छाले होंगे

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हमारी मौत पर बेशक ज़माना आएगा रोने
मगर ज़िंदा हैं जब तक चैन से जीने नहीं देगा

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'बेशक़' शब्द निश्चितता और पुष्टि का भाव लिए होता है। यह सत्य की घोषणा है, अक्सर बयानों या विश्वासों को अटल विश्वास के साथ सुदृढ़ करने के लिए उपयोग किया जाता है।

कवि 'बेशक़' का उपयोग सत्य या विश्वासों को व्यक्त करने के लिए करते हैं। यह विश्वास की शक्ति या भाग्य की अनिवार्यता को रेखांकित करने के लिए एक शक्तिशाली उपकरण के रूप में कार्य करता है।

कविता में, 'बेशक़' विश्वास की शक्ति और सत्य की स्पष्टता का प्रमाण है।