
चाहे आब-ओ-ताब समझ लो या फिर कोई ख़्वाब समझ लो
आवारा फिरना है मुझ को चाहो तो महताब समझ लो
समझो मुझ को गहराई से पहचानो तो परछाईं से
एक अकेला ही काफ़ी हूँ बेशक तुम सैलाब समझ लो
— nakul kumar
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