Meaning of

दर-ब-दर

dar-b-dar • در بدر

भटकता; उद्देश्यहीन; बेघर

wandering; aimless; homeless

آوارہ; بے مقصد; بے گھر

Persian

हम जुस्तजू-ए-यार में भटके हैं दर-ब-दर
इक दीद की तलब में कहाँ से कहाँ गए

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कहीं से दुख तो कहीं से घुटन उठा लाए
कहाँ-कहाँ से न दीवानापन उठा लाए

अजीब ख़्वाब था देखा के दर-ब-दर हो कर
हम अपने मुल्क से अपना वतन उठा लाए

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क्या बताऊँ कैसा ख़ुद को दर-ब-दर मैं ने किया
उम्र भर किस किस के हिस्से का सफ़र मैं ने किया

तू तो नफ़रत भी न कर पाएगा इस शिद्दत के साथ
जिस बला का प्यार तुझ सेे बे-ख़बर मैं ने किया

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किसे है वक़्त मोहब्बत में दर-ब-दर भटके
मैं उस के शहर गया था किसी ज़रूरत से

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है क़ब्र यूँँ बेचैन अब मेरी निगाह को
माँ देखती हो जैसे कि बेटे की राह को

तू ढूँढ़ता फिरता है जो सहरा में बस्तियाँ
मैं दर-ब-दर फिरता रहा तेरी पनाह को

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दर-ब-दर ठोकरें खाईं तो ये मालूम हुआ
घर किसे कहते हैं क्या चीज़ है बे-घर होना

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अब क्यूँँ अमान ढूँढ़ते हैं उस को दर-ब-दर
जिस को निकाल फेंक चुके ज़िंदगी से हम

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क्यूँ तेरी कल्पना मैं करूँ उम्रभर
क्यूँ तेरी वेदना में फिरूॅं दर-ब-दर

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दर से तेरे जो निकले हम, फिर भटके कूचे कूचे में
फिर दर-ब-दर हुए सनम, तेरी गली में मर गए

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मैं शजर तुम को भूल जाऊँगी
रोज़ कहती थी बात बात पे जो

पागलों की तरह भटकती है
दर-ब-दर अब मेरी तलाश में वो

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हम जुस्तजू-ए-यार में भटके हैं दर-ब-दर
इक दीद की तलब में कहाँ से कहाँ गए

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कहीं से दुख तो कहीं से घुटन उठा लाए
कहाँ-कहाँ से न दीवानापन उठा लाए

अजीब ख़्वाब था देखा के दर-ब-दर हो कर
हम अपने मुल्क से अपना वतन उठा लाए

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'दर-ब-दर' शब्द एक अंतहीन भटकाव की भावना को जागृत करता है, एक यात्रा जिसका कोई ठिकाना नहीं है। कविता में, यह अक्सर आत्मा की अर्थ या अपनापन खोजने की यात्रा का प्रतीक होता है, अस्तित्व की विशालता में खो जाने की भावना को पकड़ता है।

'दर-ब-दर' का उपयोग कवि निर्वासन और लालसा की थीम को व्यक्त करने के लिए करते हैं। यह दिल के आंतरिक निर्वासन या अपने देश से शारीरिक विस्थापन को दर्शा सकता है। यह शब्द अक्सर गहरी लालसा और अलगाव के दर्द को व्यक्त करता है।

'दर-ब-दर' अपने काव्यात्मक सार में, एक स्थान की खोज के सार्वभौमिक मानव अनुभव को पकड़ता है। यह दिल की घर की अनंत खोज के साथ गूंजता है।