है क़ब्र यूँँ बेचैन अब मेरी निगाह कोमाँ देखती हो जैसे कि बेटे की राह कोतू ढूँढ़ता फिरता है जो सहरा में बस्तियाँमैं दर-ब-दर फिरता रहा तेरी पनाह को— nakul kumar