Meaning of

फाक़ा

faqa • فاقہ

उपवास; भूख; अभाव

fasting; hunger; deprivation

روزہ; بھوک; محرومی

Arabic

फ़क़त दो-चार ईदें और बढ़ा दे साल में या रब
गले बाबा के लगने को बहाने चाहता हूँ मैं

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ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है
क्यूँँ देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम

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तुम्हारे नाम की हर लड़की से मिला हूँ मैं
तुम्हारा नाम फ़क़त तुम पे अच्छा लगता है

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यूँँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ
जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया

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हम इक ही लौ में जलाते रहे ग़ज़ल अपनी
नई हवा से बचाते रहे ग़ज़ल अपनी

दरअस्ल उस को फ़क़त चाय ख़त्म करनी थी
हम उस के कप को सुनाते रहे ग़ज़ल अपनी

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बात ऐसी भी भला आप में क्या रक्खी है
इक दिवाने ने ज़मीं सर पे उठा रक्खी है

इत्तिफ़ाक़न कहीं मिल जाए तो कहना उस सेे
तेरे शाइ'र ने बड़ी धूम मचा रक्खी है

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लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं
रुह भी होती है उस में ये कहाँ सोचते हैं

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एक सीता की रिफ़ाक़त है तो सब कुछ पास है
ज़िंदगी कहते हैं जिस को राम का बन-बास है

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ये बात अभी सब को समझ आई नहीं है
दीवाना है दीवाना तमन्नाई नहीं है

दिल मेरा दुखाकर ये मुझे तेरा मनाना
मरहम है फ़क़त ज़ख़्म की भरपाई नहीं है

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शाम ढलने से फ़क़त शाम नहीं ढलती है
उम्र ढल जाती है जल्दी पलट आना मेरे दोस्त

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फ़क़त दो-चार ईदें और बढ़ा दे साल में या रब
गले बाबा के लगने को बहाने चाहता हूँ मैं

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ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है
क्यूँँ देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम

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'फाक़ा' शब्द खालीपन और लालसा की भावना को जागृत करता है। अपने शाब्दिक अर्थ में, यह उपवास या भूख को संदर्भित करता है, लेकिन कविता में, यह अक्सर आध्यात्मिक अभाव या कुछ अप्राप्य के लिए लालसा का प्रतीक होता है।

कवि 'फाक़ा' का उपयोग आध्यात्मिक लालसा या अस्तित्वगत खालीपन के विषयों को व्यक्त करने के लिए करते हैं। यह सामाजिक उपेक्षा या व्यक्तिगत बलिदान को भी दर्शा सकता है।

कविता में, 'फाक़ा' आत्मा की भूख का रूपक बन जाता है। यह दिल की मौन पुकारों की बात करता है।