Meaning of

ग़ूल

ghool • غول

भूत; प्रेत; माया

phantom; specter; illusion

بھوت; پریت; مایا

Arabic

क़िस्से बचपन के अब कौन सुनाएगा
बच्चे तो मशग़ूल हैं अब मोबाइल में

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मैं इसी मिट्टी से उट्ठा था बगूले की तरह
और फिर इक दिन इसी मिट्टी में मिट्टी मिल गई

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मशरूफ़ हो गए थे यूँँ दुनिया की शाम में
तुम को भुलाने की ज़रा फ़ुर्सत नहीं मिली

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ग़मों को मिरे जो गिना जा रहा हैं
कि मशग़ूल हो के सुना जा रहा हैं

मिरी हैं ये किस्मत या फिर सजा हैं
कि क़ातिल मुझी से चुना जा रहा हैं

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तुम मशरूफ इंशा करते हो आधी रात को याद
तुम्हारे इंतिज़ार में आख़िर कब तक जागे कोई

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मोहब्बत की ज़मीं पे फूल रख कर
चला मैं ज़िंदगी की धूल रख कर

लगा है बे-वफ़ाई करने वो अब
मुझे इस इश्क़ में मशग़ूल रख कर

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मुझ को गिराने में यूँँ मशग़ूल मेरे अपने
मुझ को गिराते ख़ुद अपने आप गिर गए हैं

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दर्द मुहब्बत काँटे फूल
तेरी दी हर चीज़ क़ुबूल

तुझ को इक दिन खोना है
चुभता रहता है ये शूल

तेरी याद के साए में
रहता हूँ हर पल मशग़ूल

काश तुम्हें मैं पा सकता
काश दुआ होती ये क़ुबूल

चाहूँ इस दुनिया से मैं
प्यार हमारा हो मक़बूल

तुझ में बस खोना चाहूँ
दुनिया दारी सब कुछ भूल

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अहल-ए-क़लम मशग़ूल हैं या मजबूर
अच्छा लिखा, लिखके रहे हैं मसरूर

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क्या हुआ जो हो गई ग़लती हमें मक़बूल जाना
तुम समझ लेना ग़लत-फ़हमी थी और फिर भूल जाना

भूलने से पहले हो जाएँ अगर हम रू-ब-रू तो
जान कर अनजान बनना और फिर मशगू़ल जाना

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क़िस्से बचपन के अब कौन सुनाएगा
बच्चे तो मशग़ूल हैं अब मोबाइल में

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मैं इसी मिट्टी से उट्ठा था बगूले की तरह
और फिर इक दिन इसी मिट्टी में मिट्टी मिल गई

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अपने मूल अर्थ में, 'ग़ूल' एक भूतिया आकृति की रहस्यमय उपस्थिति को दर्शाता है, एक प्रेत जो धारणा के किनारों पर मंडराता है। कविता में, इस शब्द को उन अमूर्त भय और माया का प्रतीक बनाया गया है जो मानव मन में बसे रहते हैं, मन के परिदृश्य पर छाया डालते हैं।

कवि अक्सर 'ग़ूल' का उपयोग अतीत के आघातों या अधूरी इच्छाओं की भूतिया उपस्थिति को व्यक्त करने के लिए करते हैं। यह सपनों और आकांक्षाओं की मायावी प्रकृति का भी प्रतीक हो सकता है, जो हमेशा पहुँच से बाहर रहते हैं।

'ग़ूल' कविता के क्षेत्र में हमारे गहरे भय और इच्छाओं के साथ चलने वाली छायाओं की याद दिलाता है।