Meaning of

जौर-ओ-ज़ुल्म

jor-o-zulm • انتہا

उत्पीड़न; अत्याचार

oppression; tyranny

جور و ظلم; ظلم و ستم

Arabic

आग थे इब्तिदा-ए-इश्क़ में हम
अब जो हैं ख़ाक इंतिहा है ये

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इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं
दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बा'द

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याद उसे इंतिहाई करते हैं
सो हम उस की बुराई करते हैं

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फ़रिश्तों से भी अच्छा मैं बुरा होने से पहले था
वो मुझ से इंतिहाई ख़ुश ख़फ़ा होने से पहले था

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सच घटे या बढ़े तो सच न रहे
झूट की कोई इंतिहा ही नहीं

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तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ
मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ

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कहीं ये अपनी मोहब्बत की इंतिहा तो नहीं
बहुत दिनों से तिरी याद भी नहीं आई

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इब्तिदा वो थी कि जीना था मोहब्बत में मुहाल
इंतिहा ये है कि अब मरना भी मुश्किल हो गया

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इश्क़ तिरी इंतिहा इश्क़ मिरी इंतिहा
तू भी अभी ना-तमाम मैं भी अभी ना-तमाम

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न इब्तिदा की ख़बर है न इंतिहा मालूम
रहा ये वहम कि हम हैं सो वो भी क्या मालूम

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आग थे इब्तिदा-ए-इश्क़ में हम
अब जो हैं ख़ाक इंतिहा है ये

20

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इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं
दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बा'द

49

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'जौर-ओ-ज़ुल्म' शब्द ऐतिहासिक और व्यक्तिगत पीड़ा का भार वहन करता है। कविता में, यह अन्याय के खिलाफ संघर्ष और क्रूरता के सामने मानव आत्मा की दृढ़ता को उजागर करता है।

कवि 'जौर-ओ-ज़ुल्म' का उपयोग प्रतिरोध और सहनशीलता की थीमों को उजागर करने के लिए करते हैं। यह अक्सर उन छंदों में दिखाई देता है जो न्याय की मांग करते हैं या उत्पीड़ितों की दुर्दशा पर शोक व्यक्त करते हैं। यह शब्द अत्याचार का सामना करने के नैतिक कर्तव्य को रेखांकित करता है।

'जौर-ओ-ज़ुल्म' की छाया में, कविता अपनी आवाज़ पाती है, न्याय की अडिग खोज का प्रमाण।