tire ishq ki intiha chahta hoon | तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ

  - Allama Iqbal

तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ
मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ

  - Allama Iqbal

I love you Shayari

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As you were reading Shayari by Allama Iqbal

    ला फिर इक बार वही बादा ओ जाम ऐ साक़ी
    हाथ आ जाए मुझे मेरा मक़ाम ऐ साक़ी

    तीन सौ साल से हैं हिन्द के मय-ख़ाने बंद
    अब मुनासिब है तिरा फ़ैज़ हो आम ऐ साक़ी

    मेरी मीना-ए-ग़ज़ल में थी ज़रा सी बाक़ी
    शेख़ कहता है कि है ये भी हराम ऐ साक़ी

    शेर मर्दों से हुआ बेश-ए-तहक़ीक़ तही
    रह गए सूफ़ी ओ मुल्ला के ग़ुलाम ऐ साक़ी

    इश्क़ की तेग़-ए-जिगर-दार उड़ा ली किस ने
    इल्म के हाथ में ख़ाली है नियाम ऐ साक़ी

    सीना रौशन हो तो है सोज़-ए-सुख़न ऐन-ए-हयात
    हो न रौशन तो सुख़न मर्ग-ए-दवाम ऐ साक़ी

    तू मिरी रात को महताब से महरूम न रख
    तिरे पैमाने में है माह-ए-तमाम ऐ साक़ी
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    Allama Iqbal
    बाग़-ए-बहिश्त से मुझे हुक्म-ए-सफ़र दिया था क्यूँ
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    Allama Iqbal
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    मता-ए-बे-बहा है दर्द-ओ-सोज़-ए-आरज़ूमंदी
    मक़ाम-ए-बंदगी दे कर न लूँ शान-ए-ख़ुदावंदी

    तिरे आज़ाद बंदों की न ये दुनिया न वो दुनिया
    यहाँ मरने की पाबंदी वहाँ जीने की पाबंदी

    हिजाब इक्सीर है आवारा-ए-कू-ए-मोहब्बत को
    मिरी आतिश को भड़काती है तेरी देर-पैवंदी

    गुज़र-औक़ात कर लेता है ये कोह ओ बयाबाँ में
    कि शाहीं के लिए ज़िल्लत है कार-ए-आशियाँ-बंदी

    ये फ़ैज़ान-ए-नज़र था या कि मकतब की करामत थी
    सिखाए किस ने इस्माईल को आदाब-ए-फ़रज़ंदी

    ज़ियारत-गाह-ए-अहल-ए-अज़्म-ओ-हिम्मत है लहद मेरी
    कि ख़ाक-ए-राह को मैं ने बताया राज़-ए-अलवंदी

    मिरी मश्शातगी की क्या ज़रूरत हुस्न-ए-मअ'नी को
    कि फ़ितरत ख़ुद-ब-ख़ुद करती है लाले की हिना-बंदी
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    Allama Iqbal
    या रब ये जहान-ए-गुज़राँ ख़ूब है लेकिन
    क्यूँ ख़्वार हैं मर्दान-ए-सफ़ा-केश ओ हुनर-मंद

    गो इस की ख़ुदाई में महाजन का भी है हाथ
    दुनिया तो समझती है फ़रंगी को ख़ुदावंद

    तू बर्ग-ए-गया है न वही अहल-ए-ख़िरद रा
    ओ किश्त-ए-गुल-ओ-लाला ब-बख़शद ब-ख़रे चंद

    हाज़िर हैं कलीसा में कबाब ओ मय-ए-गुलगूँ
    मस्जिद में धरा क्या है ब-जुज़ मौइज़ा ओ पंद

    अहकाम तिरे हक़ हैं मगर अपने मुफ़स्सिर
    तावील से क़ुरआँ को बना सकते हैं पाज़ंद

    फ़िरदौस जो तेरा है किसी ने नहीं देखा
    अफ़रंग का हर क़र्या है फ़िरदौस की मानिंद

    मुद्दत से है आवारा-ए-अफ़्लाक मिरा फ़िक्र
    कर दे इसे अब चाँद के ग़ारों में नज़र-बंद

    फ़ितरत ने मुझे बख़्शे हैं जौहर मलाकूती
    ख़ाकी हूँ मगर ख़ाक से रखता नहीं पैवंद

    दरवेश-ए-ख़ुदा-मस्त न शर्क़ी है न ग़र्बी
    घर मेरा न दिल्ली न सफ़ाहाँ न समरक़ंद

    कहता हूँ वही बात समझता हूँ जिसे हक़
    ने आबला-ए-मस्जिद हूँ न तहज़ीब का फ़रज़ंद

    अपने भी ख़फ़ा मुझ से हैं बेगाने भी ना-ख़ुश
    मैं ज़हर-ए-हलाहल को कभी कह न सका क़ंद

    मुश्किल है इक बंदा-ए-हक़-बीन-ओ-हक़-अंदेश
    ख़ाशाक के तोदे को कहे कोह-ए-दमावंद

    हूँ आतिश-ए-नमरूद के शो'लों में भी ख़ामोश
    मैं बंदा-ए-मोमिन हूँ नहीं दाना-ए-असपंद

    पुर-सोज़ नज़र-बाज़ ओ निको-बीन ओ कम आरज़ू
    आज़ाद ओ गिरफ़्तार ओ तही कीसा ओ ख़ुरसंद

    हर हाल में मेरा दिल-ए-बे-क़ैद है ख़ुर्रम
    क्या छीनेगा ग़ुंचे से कोई ज़ौक़-ए-शकर-ख़ंद

    चुप रह न सका हज़रत-ए-यज़्दाँ में भी 'इक़बाल'
    करता कोई इस बंदा-ए-गुस्ताख़ का मुँह बंद
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    Allama Iqbal
    फिर चराग़-ए-लाला से रौशन हुए कोह ओ दमन
    मुझ को फिर नग़्मों पे उकसाने लगा मुर्ग़-ए-चमन

    फूल हैं सहरा में या परियाँ क़तार अंदर क़तार
    ऊदे ऊदे नीले नीले पीले पीले पैरहन

    बर्ग-ए-गुल पर रख गई शबनम का मोती बाद-ए-सुब्ह
    और चमकाती है उस मोती को सूरज की किरन

    हुस्न-ए-बे-परवा को अपनी बे-नक़ाबी के लिए
    हों अगर शहरों से बन प्यारे तो शहर अच्छे कि बन

    अपने मन में डूब कर पा जा सुराग़-ए-ज़ि़ंदगी
    तू अगर मेरा नहीं बनता न बन अपना तो बन

    मन की दुनिया मन की दुनिया सोज़ ओ मस्ती जज़्ब ओ शौक़
    तन की दुनिया तन की दुनिया सूद ओ सौदा मक्र ओ फ़न

    मन की दौलत हाथ आती है तो फिर जाती नहीं
    तन की दौलत छाँव है आता है धन जाता है धन

    मन की दुनिया में न पाया मैं ने अफ़रंगी का राज
    मन की दुनिया में न देखे मैं ने शैख़ ओ बरहमन

    पानी पानी कर गई मुजको क़लंदर की ये बात
    तू झुका जब ग़ैर के आगे न मन तेरा न तन
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    Allama Iqbal

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