Meaning of

सहर

sehar • سحر

भोर; सुबह; आरंभ

dawn; morning; beginning

صبح; آغاز; سحر

Arabic

कभी सहर तो कभी शाम ले गया मुझ से
तुम्हारा दर्द कई काम ले गया मुझ से

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तपते सहराओं में सब के सर पे आँचल हो गया
उस ने ज़ुल्फ़ें खोल दीं और मसअला हल हो गया

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हुस्न बला का क़ातिल हो पर आख़िर को बेचारा है
इश्क़ तो वो क़ातिल जिस ने अपनों को भी मारा है

ये धोखे देता आया है दिल को भी दुनिया को भी
इस के छल ने खार किया है सहरा में लैला को भी

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मोहब्बत से मोहब्बत मिल गई जैसे
कि सहरा में कली इक खिल गई जैसे

न जाने कैसे तुम बिन जी रहा था मैं
समझ लो हर घड़ी मुश्किल गई जैसे

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एक आवाज़ पे आ जाती है दौड़ी दौड़ी
दश्त-ओ-सहरा-ओ-बयाबान नहीं देखती है

दोस्ती दोस्ती होती है तुम्हें इल्म नहीं
दोस्ती फ़ाइदा नुक़सान नहीं देखती है

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तुम न आए तो क्या सहर न हुई
हाँ मगर चैन से बसर न हुई

मेरा नाला सुना ज़माने ने
एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई

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शब बसर करनी है, महफ़ूज़ ठिकाना है कोई
कोई जंगल है यहाँ पास में ? सहरा है कोई ?

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कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी
सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी

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सहरा से हो के बाग़ में आया हूँ सैर को
हाथों में फूल हैं मेरे पाँव में रेत है

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हम पे कर ध्यान अरे चाँद को तकने वाले
चाँद के पास तो मोहलत है सहर होने तक

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कभी सहर तो कभी शाम ले गया मुझ से
तुम्हारा दर्द कई काम ले गया मुझ से

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तपते सहराओं में सब के सर पे आँचल हो गया
उस ने ज़ुल्फ़ें खोल दीं और मसअला हल हो गया

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सहर भोर के कोमल आगमन का संकेत देता है, जो नवीनीकरण और आशा का समय है। कविता में, यह नए आरंभ और एक नई शुरुआत के वादे का प्रतीक है।

कवि सहर का उपयोग एक नए दिन की सुंदरता को जागृत करने के लिए करते हैं। यह रात के अंधकार के विपरीत होता है, आशा और नवीनीकरण का प्रतीक है।

सहर एक नई भोर के वादे को समेटे हुए है, जो आशा और अनंत संभावनाओं से भरी है।