Meaning of

शाम-ए-हिज्र

shaam-e-hijr • شام ہجر

वियोग की शाम; जुदाई की संध्या

evening of separation; twilight of parting

جدائی کی شام; فراق کی شام

Persian

सख़्त मुश्किल है ये सफ़र मेरा
कैसे होगा गुज़र-बसर मेरा

वक़्त ने भी सितम किया मुझ पर
छीनकर के अज़ीज़-तर मेरा

छाँव देता था जो मुझे वो भी
है ख़िज़ाँ दीदा अब शजर मेरा

हो इजाज़त जहाँ से जाने की
था यहीं तक मियाँ सफ़र मेरा

जिन से आगे निकल गया मैं वो
काटना चाहते हैं पर मेरा

साँवरे मुझ को भूल मत जाना
तेरा दर ही है अब तो घर मेरा

कैसे कह दूँ कुमार मैं तुम सेे
हाए जीवन है मुख़्तसर मेरा

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अज़ीज़-तर मुझे रखता है वो रग-ए-जाँ से
ये बात सच है मेरा बाप कम नहीं माँ से

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कीं कोशिशें हज़ार उसे भूल जाऊँ मैं
वो भी मय-ए-कुहन है उतरती नहीं मगर

एक उम्र काट दी उसी के इंतिज़ार में
कमबख़्त शाम-ए-हिज्र गुज़रती नहीं मगर

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सख़्त मुश्किल है ये सफ़र मेरा
कैसे होगा गुज़र-बसर मेरा

वक़्त ने भी सितम किया मुझ पर
छीनकर के अज़ीज़-तर मेरा

छाँव देता था जो मुझे वो भी
है ख़िज़ाँ दीदा अब शजर मेरा

हो इजाज़त जहाँ से जाने की
था यहीं तक मियाँ सफ़र मेरा

जिन से आगे निकल गया मैं वो
काटना चाहते हैं पर मेरा

साँवरे मुझ को भूल मत जाना
तेरा दर ही है अब तो घर मेरा

कैसे कह दूँ कुमार मैं तुम सेे
हाए जीवन है मुख़्तसर मेरा

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अज़ीज़-तर मुझे रखता है वो रग-ए-जाँ से
ये बात सच है मेरा बाप कम नहीं माँ से

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शाम-ए-हिज्र वियोग से चिह्नित एक शाम की उदासीन सुंदरता को जागृत करता है। कविता में, यह संध्या के उन घंटों का प्रतीक है जब हृदय सबसे अधिक स्मृतियों और लालसा के प्रति संवेदनशील होता है। यह शब्द प्रकाश और छाया, उपस्थिति और अनुपस्थिति के बीच के नाजुक संतुलन को पकड़ता है।

कवि शाम-ए-हिज्र का उपयोग स्मृति और समय के प्रवाह के विषयों की खोज के लिए करते हैं। इसे अक्सर चिंतन के क्षण के रूप में चित्रित किया जाता है, जहाँ आत्मा प्रेम और हानि के खट्टे-मीठे स्वभाव पर विचार करती है।

शाम-ए-हिज्र जीवन और प्रेम के क्षणभंगुर स्वभाव की एक कोमल याद दिलाता है। यह हमें उन क्षणों को संजोने के लिए आमंत्रित करता है, जहाँ सुंदरता और दुःख सह-अस्तित्व में होते हैं।