
सख़्त मुश्किल है ये सफ़र मेरा
कैसे होगा गुज़र-बसर मेरा
वक़्त ने भी सितम किया मुझ पर
छीनकर के अज़ीज़-तर मेरा
छाँव देता था जो मुझे वो भी
है ख़िज़ाँ दीदा अब शजर मेरा
हो इजाज़त जहाँ से जाने की
था यहीं तक मियाँ सफ़र मेरा
जिन से आगे निकल गया मैं वो
काटना चाहते हैं पर मेरा
साँवरे मुझ को भूल मत जाना
तेरा दर ही है अब तो घर मेरा
कैसे कह दूँ कुमार मैं तुम से
हाए जीवन है मुख़्तसर मेरा
— Kumar Aryan















