Kumar Aryan

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Kumar Aryan shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Kumar Aryan's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

दुश्मन तू मेरा हाल मेरे दोस्तों से पूछ जो तुझ से हो न पाया वही दोस्त कर गए — Kumar Aryan
मस्त हूँ अपनी फ़क़ीरी में मियाँ मैं शर्तों पर सुलतान बनकर क्या करूँँगा — Kumar Aryan
मेरे सर इल्ज़ाम सारा जाएगा फिर कोई मासूम मारा जाएगा — Kumar Aryan
इबादत है वफ़ा चाहत नहीं है वफ़ा को हुस्न से मत तौलिएगा — Kumar Aryan
कैसे हुई है तर्बियत ये जानता हूँ मैं ऐ साँप के बच्चे तुझे पहचानता हूँ मैं — Kumar Aryan
तानसेन आप हो तो हो मैं तो बावरा हूँ बावरा — Kumar Aryan
हुस्न पर गर नाज़ है तुझ को तो सुन खिलने वाला फूल मुरझाता भी है — Kumar Aryan
दो टके की कहता है औरत को जो उस की ख़ुद क्या हैसियत है वो कहे — Kumar Aryan
तुम पे तो भरोसा था तुम तो मेरे अपने थे — Kumar Aryan
दोस्ती की लाज रख ली मैं ने पर तू बता क्या तुझ को वा'दा याद है — Kumar Aryan
मम्नून हूँ मैं अपने बिरादर अज़ीज़ का रखता है दूर घर की परेशानी से मुझे — Kumar Aryan
जगाए नींद से मुझ को न कोई मेरे अंदर का आशिक़ सो रहा है — Kumar Aryan
आ रहा है वक़्त अब मतदान का फिर यहाँ लाशें बिछाई जाएँगी — Kumar Aryan
तुझ से बिछड़ के किसलिए मैं चश्म-ए-नम रहूँ बेशक गया है तू प तेरी याद तो नहीं — Kumar Aryan
इतनी जल्दी क्या थी शोहरत पाने की तुम तो सीधे रस्ते भी आ सकते थे — Kumar Aryan
मैं खड़ा आज भी हूँ राह-गुज़र पर उन की छोड़ के चल भी दिए छोड़ के जाने वाले — Kumar Aryan
बेटा तो डॉक्टर है बड़ा नामी शहर में और बाप चल बसा है कमी से इलाज की — Kumar Aryan
लड़का है यार तू तेरा दर्द कोई लडक़ी नहीं समझेगी — Kumar Aryan

Ghazal

बहुत सहमा सा घबराता हुआ महसूस होता है मुझे जो दूर से आता हुआ महसूस होता है बला तो ज़िन्दगी से हो गई रुख़्सत बहुत पहले मेरा दिल अब भी घबराता हुआ महसूस होता है यहाँ बाद-ए-बहारी तो चली है रोज़-ओ-शब पैहम मगर हर फूल मुरझाता हुआ महसूस होता है बहुत दहशत-ज़दा लगता है वो ख़ुद अपनी बस्ती में यही कारण वो हकलाता हुआ महसूस होता है कभी मूँदे कभी खोले वो अपने हाथ की मुट्ठी मुझे वो राज़ समझाता हुआ महसूस होता है जिसे हम ने सिखाया ज़िन्दगी जीने का हर इक फ़न हमें तलकीन फ़रमाता हुआ महसूस होता है ज़माने ने ज़बाँ उस की बहुत पहले तराशी थी वही इमरोज़ चिल्लाता हुआ महसूस होता है फ़क़ीरी में गुज़ारी जिस ने ख़ुद ही ज़िन्दगी अपनी फ़क़ीरों को वो ठुकराता हुआ महसूस होता है — Kumar Aryan
साथ अपनों ने दिया है न ज़माने वाले आज सब लोग हैं एहसान जताने वाले अब यक़ीं किस पे करूँँ किस को कहूँ मैं अपना रिश्ते तोड़े हैं सभी रिश्ते निभाने वाले अपने अरमाँ की लहद में हूँ मैं मदफ़ून मगर अब भी ज़िंदा हैं मेरी ख़ाक उड़ाने वाले वक़्त ने कैसे पलट दी यहाँ बाज़ी सारी अब हैं ख़ामोश यहाँ सब को हँसाने वाले किस तरह धुंद में पोशीदा हुए हैं लोगों मेरी आँखों को नए ख़्वाब दिखानेवाले तुम को रुसवाई-ए-आलम का ज़रा ख़ौफ़ नहीं लिख के दिल पर यूँँ मेरा नाम मिटाने वाले अब कहाँ अपनी ख़ताओं पे पशेमानी है हम फ़क़त रह गए हैं अश्क बहाने वाले सिर्फ़ आँखों के इशारे नहीं काफ़ी होंगे पास भी आओ मेरे मुझ को मनाने वाले तिश्नगी उस के तबस्सुम ने बढ़ाई अक्सर अब मिरे अश्क ही हैं प्यास बुझाने वाले — Kumar Aryan
काँटे ही काँटे बिछे हैं फ़र्श पर चादर नहीं एक ही कमरा है लेकिन उस में भी बिस्तर नहीं क्या कहा मुझ सेे कि कोई आपसे सुंदर नहीं सनअत-ए-क़ुदरत में कोई चीज़ भी कमतर नहीं ज़िन्दगी में दोस्ती हम ने तो की है ख़ूब ही हैं हज़ारों दोस्त लेकिन आपसे बेहतर नहीं यार ने भी ख़ूब खेला खेल लेकिन क्या कहें दिल शिकस्ता करने में उस का कोई हम सेर नहीं किस भरोसे से करूँँ अब आपसे उम्मीद मैं आप तो रहजन ही निकले इश्क़ में रहबर नहीं आप ख़ुद अपनी निगाहों में गिरे हैं क्या कहें जब के मैं ने आप को समझा कभी नौकर नहीं ये सियासी लोग ख़ुद को क्या समझते हैं भला इनको दुनिया में ख़ुदाई से भी कोई डर नहीं बेच देते हैं गरीबों की ज़रूरत बे-झिझक इतना ख़ुद ही बोलिए क्या आप सौदागर नहीं — Kumar Aryan
यूँँ मौत को गले से लगाने चला था मैं इक बे-वफ़ा को फिर से मनाने चला था मैं इंसाफ़ के सरों को उठाने चला था मैं हक़ उस का उस को यार दिलाने चला था मैं राहों पे चलते-चलते हुए कैसे गिर गया सोते हुए को आज जगाने चला था मैं दुनिया को ख़ुद ही दुश्मन-ए-जाँ यार कर लिया हक़ का सवाल जब भी उठाने चला था मैं मालूम था कि साँप मेरी आस्तीं में है दीवानगी में दूध पिलाने चला था मैं ता'बीर जिस की कोई नहीं है जहान में आँखों को ऐसे ख़्वाब दिखाने चला था मैं ग़ुर्बत की मेरी शहर में चर्चे हुए बहुत भूखे को यार भोज कराने चला था मैं इक संग-दिल से दिल को थी उल्फ़त की आरज़ू पानी में जैसे आग लगाने चला था मैं आख़िर मैं कैसे होश में रहता ख़ुदा क़सम सूरज से जब के आँख मिलाने चला था मैं — Kumar Aryan