ज़रा सोच कर तुम कहो मुझ सेे यारा
कि तुम हो मेरे वो भी सारा का सारा
ये माना कि सूरज नहीं पास अपने
पर उस से नहीं कम है जुगनू हमारा
उक़ाबों की करता है ये रहनुमाई
यही बुझती आँखों का है इक सहारा
अभी वक़्त है जितना ढा लो सितम तुम
चलेगा किसी रोज़ सिक्का हमारा
नदी हो तुम्हारा है मीठा-सा पानी
मेरा क्या है मैं तो समुंदर हूँ खारा
ये है प्रेम इस
में नहीं द्वैत शामिल
सदा एक ही से हुआ है गुज़ारा
मुसीबत का हल ख़ुद-कुशी तो नहीं है
ख़बरदार जो ऐसा सोचा दुबारा
— Kumar Aryan















