यूँँ मौत को गले से लगाने चला था मैं
इक बे-वफ़ा को फिर से मनाने चला था मैं
इंसाफ़ के सरों को उठाने चला था मैं
हक़ उस का उस को यार दिलाने चला था मैं
राहों पे चलते-चलते हुए कैसे गिर गया
सोते हुए को आज जगाने चला था मैं
दुनिया को ख़ुद ही दुश्मन-ए-जाँ यार कर लिया
हक़ का सवाल जब भी उठाने चला था मैं
मालूम था कि साँप मेरी आस्तीं में है
दीवानगी में दूध पिलाने चला था मैं
ता'बीर जिस की कोई नहीं है जहान में
आँखों को ऐसे ख़्वाब दिखाने चला था मैं
ग़ुर्बत की मेरी शहर में चर्चे हुए बहुत
भूखे को यार भोज कराने चला था मैं
इक संग-दिल से दिल को थी उल्फ़त की आरज़ू
पानी में जैसे आग लगाने चला था मैं
आख़िर मैं कैसे होश में रहता ख़ुदा क़सम
सूरज से जब के आँख मिलाने चला था मैं















