कीं कोशिशें हज़ार उसे भूल जाऊँ मैंवो भी मय-ए-कुहन है उतरती नहीं मगरएक उम्र काट दी उसी के इंतिज़ार मेंकमबख़्त शाम-ए-हिज्र गुज़रती नहीं मगर— Faiz Ahmad