Meaning of

तक़ाज़ा

taqaaza • تقاضا

मांग; अनुरोध; आवश्यकता

demand; request; requirement

تقاضا; درخواست; ضرورت

Arabic

फ़न आता तो सिखला देता इस
में मेरा क्या जाता है
मैं ने तो बस इश्क़ किया था मुझ को फ़न-वन नइँ आता है

उस को तो अब भी ये लगता है उस ने छोड़ा है मुझ को
कोई उसे समझाओ शे'र कभी भी घास नहीं खाता है

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अपने दिल में बसाओगे हम को
और गले से लगाओगे हम को

हम नहीं इतने प्यार के क़ाबिल
तुम तो पागल बनाओगे हम को

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याराँ वो जो है मेरा मसीहा-ए-जान-ओ-दिल
बे-हद अज़ीज़ है मुझे अच्छा किए बग़ैर

मैं बिस्तर-ए-ख़याल पे लेटा हूँ उस के पास
सुब्ह-ए-अज़ल से कोई तक़ाज़ा किए बग़ैर

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करती है तो करने दे हवाओं को शरारत
मौसम का तकाज़ा है कि बालों को खुला छोड़

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दुश्मनी कर मगर उसूल के साथ
मुझ पर इतनी सी मेहरबानी हो

मेरे में'यार का तक़ाज़ा है
मेरा दुश्मन भी ख़ानदानी हो

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मुझ को ये आरज़ू वो उठाएँ नक़ाब ख़ुद
उन को ये इंतिज़ार तक़ाज़ा करे कोई

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आदमी जान के खाता है मोहब्बत में फ़रेब
ख़ुद-फ़रेबी ही मोहब्बत का सिला हो जैसे

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जो करियर की चिंता करते हैं उन
में आता हूँ मैं
आसन प्राणायाम वग़ैरा भी करने जाता हूँ मैं

तुम को अच्छे लगते होंगे एब्स मिरे यारों लेकिन
माँ को लगता है, टाइम पे खाना नईं खाता हूँ मैं

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करूँँगा मैं क्या अब बताता नहीं हूँ
सो अब पीठ पर ज़ख़्म खाता नहीं हूँ

सभी लूट जाए भले आज कल पर
किसी दर पे मैं सर झुकाता नहीं हूँ

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हमारे घर के रिश्तों में अभी बारीकियाँ कम हैं
भतीजा मार खाता है तो चाचा बोल देते हैं

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फ़न आता तो सिखला देता इस
में मेरा क्या जाता है
मैं ने तो बस इश्क़ किया था मुझ को फ़न-वन नइँ आता है

उस को तो अब भी ये लगता है उस ने छोड़ा है मुझ को
कोई उसे समझाओ शे'र कभी भी घास नहीं खाता है

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अपने दिल में बसाओगे हम को
और गले से लगाओगे हम को

हम नहीं इतने प्यार के क़ाबिल
तुम तो पागल बनाओगे हम को

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तक़ाज़ा एक दबावपूर्ण आवश्यकता या मांग की भावना को व्यक्त करता है, जो अक्सर एक ऐसी तात्कालिकता को वहन करता है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। कविता में, यह उन आंतरिक और बाहरी आह्वानों को दर्शाता है जो व्यक्तियों को क्रिया या आत्मनिरीक्षण की ओर प्रेरित करते हैं।

कवि तक़ाज़ा का उपयोग इच्छाओं की तात्कालिकता या समय की मांगों को व्यक्त करने के लिए करते हैं। इसका उपयोग व्यक्तिगत आवश्यकताओं और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच तनाव का पता लगाने के लिए किया जा सकता है।

तक़ाज़ा जीवन की निरंतर मांगों की बात करता है। यह हमें तात्कालिकता और धैर्य के बीच संतुलन की खोज की याद दिलाता है।