तुम्हारे ख़्वाब पलकों पर सजाने वाले कितने हैं

तुम्हारे नाज़ हँस कर के उठाने वाले कितने हैं

तुम्हारी बात भी अपनी जगह पर ठीक है लेकिन
सभी हैं चाहने वाले, निभाने वाले कितने हैं

अभी तो घर बसाने के लिए सौ लोग राज़ी हैं
हमेशा के लिए दिल में बसाने वाले कितने हैं

कई ने ताज-महलों को बनाने की कही होगी
मगर अपनी तरह अपना बनाने वाले कितने हैं

ज़माना है, तुम्हें ये मा'मले मालूम भी होंगे
लगाने वाले कितने हैं, बुझाने वाले कितने हैं

तुम्हारे नाम पर चित हैं, तुम्हारे नाम पर पट हैं

तुम्हारे नाम से सिक्का चलाने वाले कितने हैं
ढुलकते आँसुओं को पोछने वालों की छोड़ो भी

तुम्हारे दर्द में आँसू बहाने वाले कितने हैं
तुम्हारी आस में जीते हैं, मरते हैं - ये लगता है

मगर ये देख लेना काम आने वाले कितने हैं

— Dr. Rahul Awasthi

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