badan ke dono kinaaron se jal raha hooñ main | बदन के दोनों किनारों से जल रहा हूँ मैं

  - Irfan Siddiqi

बदन के दोनों किनारों से जल रहा हूँ मैं
कि छू रहा हूँ तुझे और पिघल रहा हूँ मैं

तुझी पे ख़त्म है जानाँ मेरे ज़वाल की रात
तू अब तुलू भी हो जा कि ढल रहा हूँ मैं

बुला रहा है मेरा जामा-ज़ेब मिलने को
तो आज पैरहन-ए-जाँ बदल रहा हूँ मैं

ग़ुबार-ए-राहगुज़र का ये हौसला भी तो देख
हवा-ए-ताज़ा तिरे साथ चल रहा हूँ मैं

मैं ख़्वाब देख रहा हूँ कि वो पुकारता है
और अपने जिस्म से बाहर निकल रहा हूँ मैं

  - Irfan Siddiqi

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