कभी ख़ामोश रहकर भी तमाशा देख लेता हूँ
तेरी आँखों में लिपटा इक फ़साना देख लेता हूँ
कभी तन्हाइयों में दिल बहुत चुपचाप रोता है
उसी ख़ामोश आँसू में सितारा देख लेता हूँ
लबों से जो न कह पाए वो आँसू बोल जाते हैं
मैं उनकी ख़ामुशी में भी नज़ारा देख लेता हूँ
मैं जलते शहर की ख़ामोशियाँ भी पी गया कब का
मगर अब भी धुएँ में इक उजाला देख लेता हूँ
मैं अपनी तिश्नगी में भी समंदर ढूँढ लेता हूँ
कभी जज़्बात पीकर भी नशा सा देख लेता हूँ
वो चेहरा जब नज़र से दूर होता है कई दिन तक
मैं शीशे में तसव्वुर का सहारा देख लेता हूँ
उठा लेती है ख़ुशबू हर तरफ़ बिखरे हुए लम्हे
मैं वीरानी की दीवारों पे नक़्शा देख लेता हूँ
जला कर रौशनी वो दूर बैठा मुस्कराता है
मैं गिरती बूँद में टूटा शरारा देख लेता हूँ
परिंदा अब हवाओं से भी रस्ता माँग लेता है
कभी उड़ते हुए ख़ुद को किनारा देख लेता हूँ
As you were reading Shayari by Kushal "PARINDA"
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