इश्क़ कर के रोज़ उस

में तू जला कर
कोई मंज़िल ही नहीं बस तू चला कर

सोचता हूँ दर्द अपने फूँक डालूँ
जिस्म तेरा सर्द रातों में जला कर

साहिब-ए-मसनद ग़ुलामी चाहते हैं
शाह वाले सर झुका के अब चला कर

रौशनी मत कर चराग़ों के सहारे
कर उजाला नूर-ए-ईमाँ को जला कर

लोग चाहे ज़ुल्म बरपाए तुझी पर
मुस्कुरा के उन सभी का तू भला कर

— Rizwan Khoja "Kalp"

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