shaam-e-rangeen gulbadan gulfaam hai | शाम-ए-रंगीं गुलबदन गुलफ़ाम है

  - SALIM RAZA REWA

शाम-ए-रंगीं गुलबदन गुलफ़ाम है
मिल गए तुम जाम का क्या काम है

ये वज़ीफा़ मेरा सुब्ह-ओ-शाम है
मेरे लब पर सिर्फ़ तेरा नाम है

मेरा घर ख़ुशियों से है फूला-फला
मेरे रब का ये बड़ा इनआम है

तुम ही साँसों में तुम्ही धड़कन में हो
ज़िन्दगी मेरी तुम्हारे नाम है

धूप में साया हो जैसे छाँव का
काकुल-ए-जानाँ में यूँँ आराम है

पा के सुर्ख़ी आपके रुख़सार की
ख़ूबसूरत आज कितनी शाम है

आप की क़ुर्बत मुझे हासिल हुई
ये मोहब्बत का मेरे इकराम है

  - SALIM RAZA REWA

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